Tuesday, 31 July 2012

" छोड़ दो ....."
















" छोड़  दो ....."

छोड़  दो  ऊँचे  पलंग  पर  गद्दी  ले  कर  बैठना ..
छोड़  दो  चौपाल  पर  सहमे  दलित  को  पीटना ..
छोड़  दो  वारिस  के  जूते  को  सलामी  ठोकना ..
छोड़  दो  जलते  तवे  पर  अपनी  रोटी  सेकना ..
छोड़  दो  जाने  भी  दो  रहने  दो  थर्राना ...
जंग  बेबुनियाद  है  ये  सबको  बतलाना ...!!

छोड़  दो  लाचार  की  क़िस्मत  को  हँस  कर  देखना ..
छोड़  दो  इज्ज़त  परायी  दो  टके  में  बेचना  ..
छोड़  दो  ताबीज़  बन  कर  गर्दनों  पर  लेटना ..
छोड़  दो  शागिर्द  बन  कर  दाद  कोरी  फैंकना ..
छोड़  दो  बन्दों  सुखनबाज़ी  में  मर  जाना ...
रंग  बे  सर  ताज  है  ये  सबको  बतलाना ...!!

छोड़  दो  घर  से  निकल  कर  रास्तों  पर  थूंकना ..
छोड़  दो  दरबान  को  छोटी  नज़र  से  देखना ..
छोड़  दो  साज़िश  में  छिलते  हादसों  को  छेदना ..
छोड़  दो  शायर  के  तूफ़ानी  असर  को  छेड़ना ...
छोड़  दो  रहमत  के  बाशिंदों  को  ठुकराना ..
वक़्त  उलझा  जाल  है  ये  सबको  बतलाना ...!!

छोड़  दो  खादी  पहन  कर  कुर्सियों  को  ताकना ..
छोड़  दो  मुश्किल  घड़ी  के  रुख़  से  कन्नी  काटना ..
छोड़  दो  चिकने  बदन  पर  लार  बन  कर  भीगना ..
छोड़  दो  आदम  की  मजबूरी  के  पर्चे  बाँटना ...
छोड़  दो  कौवे  को  काला  कह  के  हड़काना ..
कर्म  बे  वरदान  है  ये  सबको  बतलाना .........!!

*************** विक्रम  चौधरी ***************



Friday, 13 July 2012

" नींद ......"


















" नींद ......" 

आ  गयी  है  नींद  मुझको  अब  तो  सोने  दो 
राख़  में  शमशान  की  ख़ामोशी  होने  दो ....
दास  ने  माँगी  है  हक़  के  बदले  मालिक  की  दुआ 
ए  मालिकों  इस  कर्म  को  इन्साफ़  अब  तुम  दो ...!!

ज़िन्दगी  भर  ज़िन्दगी  देती  रही  ताना 
रूप  का  छिछला  असर  था  खेल  मस्ताना 
अब  जिस्म  की  पगडंडियों  के  दाग  धुलने  दो 
ख़ाब  को  दे  दो  किनारा  भोर  फटने  दो ...............!!

बाँट  कर  गुड्दानियाँ  खोला  है  मयखाना 
चुटकुला  नमकीन  चटकारा  है  ग़म  खाना 
मन  की  मर्ज़ी  के  हलक़  पर  हार  चढ़ने  दो 
रूह  के  मासूम  चेहरे  को  निखरने  दो ................!!

छोड़  दो  बेकार  की  बातों  पे  शर्माना 
मुफ़्त  में  उछली  शरम  पर  मर के  दिखलाना 
अब  नर्म  पड़ते  वक़्त  को  ठोकर  ना  लगने  दो 
और  बेबसी  की  चोट  पर  क़िस्से  ना  गढ़ने  दो ...!!

नोट  पर  गाँधी  के  चश्मे  का  लगा  होना 
कहता  है  देखो  वफ़ादारी  ना  तुम  खोना 
आँख  पर  बेइमानियों  की  रोक  लगने  दो 
कच्चे  पड़े  ईमान  को  जल्दी  से  पकने  दो .........!!

************** विक्रम  चौधरी ******************