Friday, 17 August 2012

" सरफिरी तमन्ना ......"






















" सरफिरी  तमन्ना ......"

मेरी  सरफिरी  तमन्ना  सचमुच  ही  बावरी  है ...
जूते  पहन  के  नकली  सड़कों  पे  भागती  है ...
मेरे  जिस्म  को  सजा  कर  कलेजा  चाखती  है ...
मेरी  अन्जुमन  की  शह  ने  मुझको  ही  मात  दी  है ... 
मेरी  सरफिरी  तमन्ना  सचमुच  ही  बावरी  है ...........!!

वो  जानती  नहीं  है  थमना  भी  लाज़मी  है ...
ग़र  है  ज़हर  जहां  तो  आबेहयात  भी  है ...
बूढ़ों  के  सर  की  छत  का  साया  तैनात  भी  है ...
पर  नासमझ  वो  मेरा  ही  ग़म  उछालती  है ...
मेरी  सरफिरी  तमन्ना  सचमुच  ही  बावरी  है ...........!!   

ये  चाँदनी  में  सर  के  बालों  को  काढ़ती  है ...
बिल्ली  को  दूध  दे  कर  चूहों  को  पालती  है ...
पक्षी  को  दे  के  दाना  मुर्गों  को  काटती  है ...
रस्ता  बदल  बदल  कर  दहशत  ये  बाँटती  है ...

हो  आसतीन  ऐसी  जो  साँप  से  परे  हो ...
जैसे  कि  टूटा  पत्ता  फिर  शाख़  से  जुड़ा  हो ...
लेकिन  वो  धूल  बन  कर  चेहरों  को  ढांपती  है ...
तीतर  का  गोश्त  खा  कर  मेरा  दम  उबालती  है ...
मेरी  सरफिरी  तमन्ना  सचमुच  ही  बावरी  है ...........!!  

वो  जानती  नहीं  है  कम्सिन  ये  नाज़नीं  है ...
घर  में  लगा  के  बिस्तर  ये  घर  उजाड़ती  है ...
मेरी  सरफिरी  तमन्ना  सचमुच  ही  बावरी  है ...........!!  

ये  नौकरी  में  हफ़्ते  रिश्वत  के  माँगती  है ...
बेहूदे  चुटकुलों  पर  हँस  हँस  के  हाँफती  है ... 
मंगतों  को  भूख  दे  कर  भूखों  को  फाँकती  है ...
सच्चों  की  बेईज्ज़ती  पर  खुद  को  निहारती  है ...

लिखो  कोई  कहानी  जो  अंत  से  परे  हो ...
जैसे  कि  रोता  बच्चा  फिर  मुस्कुरा  पड़ा  हो ...
लेकिन  वो  दर  सुखन  का  काँटों  से  झाड़ती  है ...
ममता  की  मुफ़्लिसी  पर  आँचल  को  फाड़ती  है ...
मेरी  सरफिरी  तमन्ना  सचमुच  ही  बावरी  है ...........!!   

वो  जानती  नहीं  है  मौसम  ये  आख़िरी  है ...
बिन  बारिशों  के  बादल  को  वो  दुलारती  है ... 
मेरी  सरफिरी  तमन्ना  सचमुच  ही  बावरी  है ...........!!  

************** विक्रम  चौधरी *****************

Thursday, 16 August 2012

" मतवारे मनवा ......"




















" मतवारे  मनवा ......"


मतवारे  मनवा
मन  बाँच  बाँच  हारे  चिठिया ...
दिखलावे  सपना 
मन  बेशुमार  बाँटे  चिठिया .....!!

मन  मर्ज़ी  के  अश्क़  बहावे  
मन  की  हँसी  हँसावे ...
मन  श्रृंगार  करे  मन  अन्दर 
मन  की  पटी  पढ़ावे ...

मन  से  हारे  मन  सुलगावे 
मन  की  बात  बिसारे ...
मन  से  जीते  मन  मुस्कावे 
मन  की  मौज  उबारे ...
मन  मण्डी  के  भाव  उठावे 
मन  की  पुड़ी  बनावे ...
मन  संवाद  करे  मन  अन्दर 
मन  की  छुरी  चलावे ...

मतवारे  मनवा
मन  बाँच  बाँच  हारे  चिठिया ...
दिखलावे  सपना 
मन  बेशुमार  बाँटे  चिठिया .....!!

मन  के  द्वारे  मन  भरमावे 
मन  की  लाज  उजाड़े ...
मन  से  भीगे  मन  ललचावे 
मन  की  खाल  उतारे ...
मन  मिथ्या  के  भोग  लगावे 
मन  की  नदी  बहावे ...
मन  अँगार  चखे  मन  अन्दर 
मन  की  मति  फिरावे ... 

मतवारे  मनवा
मन  बाँच  बाँच  हारे  चिठिया ...
दिखलावे  सपना 
मन  बेशुमार  बाँटे  चिठिया .....!!

******* विक्रम  चौधरी *******


Tuesday, 14 August 2012

" सरकार की हिंसा ....."
















" सरकार  की  हिंसा ....."

बीहड़  में  कूदे  हिम्मत  हारे  बेबस  इन्सां ...
रोटी  पे  चुभा  फ़रमान  दिखे  सरकार  की  हिंसा ...
क़ानून  तवायफ़  के  कोठे  सा  भाव  करे ...
बेईमान  समाजी  दुकां  पे  नरसंहार  करे ...
बेख़ौफ़  क़लन्दर  बना  है  बन्दर  बढ़ी  है  चिंता ...
सूली  पे  टिका  अरमान  दिखे  सरकार  की  हिंसा ... !!

नक्सलबारी  की  बाड़  बहे
सम्मान  बिलखती  जान  दिखे ...
कहीं  बँटे  धर्म  कहीं  ज़ात  बिक़े
कहीं  शिक्षा  भी  असमान  बँटे ...
कहीं  हाथ  भरे  पर  बोझ  नहीं 
कहीं  बोझ  से  दब  कर  हाथ  मरे ...
नफ़रत  से  रूख़े  असमत  हारे  बेदुम  इन्सां ...
चोटी  पे  चढ़ा  एहसान  दिखे  सरकार  की  हिंसा ......!!

सागर  की  लहर  ने  खोयी  हँसी
धरती  जल  का  व्यापार  करे ....
पर्वत  की  सहर  में  है  बेबसी
जंगल  चिड़ियों  पे  वार  करे ....
बारिश  की  छुअन  पे  रोयी  ज़मीं
बदरा  बंजरपन  दान  करे .....
अँधे  बन  घूमे  रहमत  हारे  बेकस  इन्सां ...
मिट्टी  पे  लुटा  वरदान  दिखे  सरकार  की  हिंसा .....!!

है  कौन  क़यामतकारी  है  किसकी  नीयत  भारी .....
जन्मेगा  कब  ये  कलकि  है  किसकी  ज़िम्मेदारी ....
सीरत  के  झूठे  शिद्दत  हारे  बेसुध  इन्सां ...
गिद्धों  का  बुना  जंजाल  दिखे  सरकार  की  हिंसा ......!!   

**************** विक्रम  चौधरी *****************           

        

Tuesday, 31 July 2012

" छोड़ दो ....."
















" छोड़  दो ....."

छोड़  दो  ऊँचे  पलंग  पर  गद्दी  ले  कर  बैठना ..
छोड़  दो  चौपाल  पर  सहमे  दलित  को  पीटना ..
छोड़  दो  वारिस  के  जूते  को  सलामी  ठोकना ..
छोड़  दो  जलते  तवे  पर  अपनी  रोटी  सेकना ..
छोड़  दो  जाने  भी  दो  रहने  दो  थर्राना ...
जंग  बेबुनियाद  है  ये  सबको  बतलाना ...!!

छोड़  दो  लाचार  की  क़िस्मत  को  हँस  कर  देखना ..
छोड़  दो  इज्ज़त  परायी  दो  टके  में  बेचना  ..
छोड़  दो  ताबीज़  बन  कर  गर्दनों  पर  लेटना ..
छोड़  दो  शागिर्द  बन  कर  दाद  कोरी  फैंकना ..
छोड़  दो  बन्दों  सुखनबाज़ी  में  मर  जाना ...
रंग  बे  सर  ताज  है  ये  सबको  बतलाना ...!!

छोड़  दो  घर  से  निकल  कर  रास्तों  पर  थूंकना ..
छोड़  दो  दरबान  को  छोटी  नज़र  से  देखना ..
छोड़  दो  साज़िश  में  छिलते  हादसों  को  छेदना ..
छोड़  दो  शायर  के  तूफ़ानी  असर  को  छेड़ना ...
छोड़  दो  रहमत  के  बाशिंदों  को  ठुकराना ..
वक़्त  उलझा  जाल  है  ये  सबको  बतलाना ...!!

छोड़  दो  खादी  पहन  कर  कुर्सियों  को  ताकना ..
छोड़  दो  मुश्किल  घड़ी  के  रुख़  से  कन्नी  काटना ..
छोड़  दो  चिकने  बदन  पर  लार  बन  कर  भीगना ..
छोड़  दो  आदम  की  मजबूरी  के  पर्चे  बाँटना ...
छोड़  दो  कौवे  को  काला  कह  के  हड़काना ..
कर्म  बे  वरदान  है  ये  सबको  बतलाना .........!!

*************** विक्रम  चौधरी ***************



Friday, 13 July 2012

" नींद ......"


















" नींद ......" 

आ  गयी  है  नींद  मुझको  अब  तो  सोने  दो 
राख़  में  शमशान  की  ख़ामोशी  होने  दो ....
दास  ने  माँगी  है  हक़  के  बदले  मालिक  की  दुआ 
ए  मालिकों  इस  कर्म  को  इन्साफ़  अब  तुम  दो ...!!

ज़िन्दगी  भर  ज़िन्दगी  देती  रही  ताना 
रूप  का  छिछला  असर  था  खेल  मस्ताना 
अब  जिस्म  की  पगडंडियों  के  दाग  धुलने  दो 
ख़ाब  को  दे  दो  किनारा  भोर  फटने  दो ...............!!

बाँट  कर  गुड्दानियाँ  खोला  है  मयखाना 
चुटकुला  नमकीन  चटकारा  है  ग़म  खाना 
मन  की  मर्ज़ी  के  हलक़  पर  हार  चढ़ने  दो 
रूह  के  मासूम  चेहरे  को  निखरने  दो ................!!

छोड़  दो  बेकार  की  बातों  पे  शर्माना 
मुफ़्त  में  उछली  शरम  पर  मर के  दिखलाना 
अब  नर्म  पड़ते  वक़्त  को  ठोकर  ना  लगने  दो 
और  बेबसी  की  चोट  पर  क़िस्से  ना  गढ़ने  दो ...!!

नोट  पर  गाँधी  के  चश्मे  का  लगा  होना 
कहता  है  देखो  वफ़ादारी  ना  तुम  खोना 
आँख  पर  बेइमानियों  की  रोक  लगने  दो 
कच्चे  पड़े  ईमान  को  जल्दी  से  पकने  दो .........!!

************** विक्रम  चौधरी ******************

Monday, 21 May 2012

" तक़दीर फिर ......"


















" तक़दीर  फिर ......"

क्यों  ना  ये  तक़दीर  फिर   
ख़ामोश  हो  कर  चल  पड़े …
चीर  कर  सिकुड़ी  लक़ीरें  
बात  फिर  से  बन  पड़े  ......!

फ़ुर्सत  से  बैठे  काल  ने 
जकड़ी  हैं  बाहें  प्राण  की 
ना  दम  उगलते  बन  रहा  
ना  नब्ज़  ठहरे  जान  की ...!

अल्लहड़  भी  है  चितचोर  है 
ये  आत्मा  बे  छोर  है  ..
निर्बल  पे  थोपे  नियति 
परमात्मा  भी  चोर  है .......!

घुँघरू  बजे  चौराहों  पर 
ये  भीड़  सुन  कर  थम  पड़े  
पल  भर  तमाशे  के  लिए 
अब  नौनिहाली  कट  पड़े …!

जीवन  का  हल  मृत्यु  में  है 
पर  ज़िन्दगी  घुड़दौड़  है  …
ये  इन्तेहाँ  है  सब्र  की 
कोशिश  पे  कसती  डोर  है ....!! 

****** विक्रम  चौधरी *******

Wednesday, 16 May 2012

" ओ मोरे चन्दा ......"




















" ओ  मोरे  चन्दा ......"

रात  के  रंग  में  रंगी  मन  माटी 
नींद  की  छत  पे  तारे  हैं  बाराती 
ओ  मोरे  चन्दा  ओ  मोरे  साथी .....!!

गयी  पनघट  की  प्यास  नहाती 
भोर  ने  पकड़ी  सूर्य  की  बाती 
ओ  मोरे  चन्दा  ओ  मोरे  साथी .....!!

उतरन  पहनाती  शाम 
खोयी  बैरन  अपने  गाम 
अन्धेरा  जब  खोले  पाँव 
कौन  अल्लाह  कौन  है  राम ...
कृष्ण  के  रथ  की  जीत  है  आधी ...
मुर्शद  के  बिन  हार  ख़ुदा  की ...
ओ  मोरे  चन्दा  ओ  मोरे  साथी .....!!

जल  बिन  लहराती  नाव 
छिल  छिल  दिखलाती  घाव 
नदिया  के  पथ  सूखी  छाँव 
कौन  राजा  कौन  ग़ुलाम ...
स्वप्न  के  तन  की  पीर  है  दासी ...
दर्शन  तप  बिन  चाह  दुआ  की ...
ओ  मोरे  चन्दा  ओ  मोरे  साथी .....!!

********* विक्रम  चौधरी ************

Monday, 14 May 2012

" कुछ तू बता ..... "


















" कुछ  तू  बता ..... "

बंद  है  बरसात  के  
गिरने  का  हर  एक  रास्ता ...
अश्क़ों  ने  छीना  है  फ़लक
बरसे  हैं  बन  के  दास्ताँ ...
क्या  हाल  है  ए  ज़िन्दगी ...
कुछ  मैं  कहूँ  कुछ  तू  बता ....!!

मस्ती  के  मयखानों  में  अब 
साक़ी  नहीं  ना  जाम  है ...
लगता  है  हर  नुक्कड़  शहर 
खाली  हैं  सब  ना  काम  है ...
इठला  रही  है  रौशनी 
दरिया  में  सूरज  जा  छुपा ...
क्या  हाल  है  ए  ज़िन्दगी ...
कुछ  मैं  कहूँ  कुछ  तू  बता ....!!

मौला  ने  कर  ली  है  सुलह 
जारी  किया  फ़रमान  है ...
छूटी  है  हर  घर  से  बसर 
दड़बों  में  अब  आवाम  है ...
ज़िद्दी  है  बन्दा  बेफ़िक़र 
कहता  है  ख़ुद  को  आसमां ...
क्या  हाल  है  ए  ज़िन्दगी ...
कुछ  मैं  कहूँ  कुछ  तू  बता ....!!

******* विक्रम  चौधरी ********

Saturday, 28 April 2012

“ खेल है ये ज़िन्दगानी ……..”


















“ खेल  है  ये  ज़िन्दगानी ....”

रात  की  बैरन  ख़ाक  छान  ले …
ख़ाब  की  बेरंग  राख़  बाँट  ले …
दो  चार  दिनों  का  खेल  है  ये  … 
खेल  है  ये  जिंदगानी ……!!
माशूक़  नहीं  पर  इश्क़  है  ये …  
इश्क़  है  ये  जिंदगानी ….....!!
मायूस  पड़ी  हैं  पंखुड़ियाँ  
बस  फूल  है  ये  जिंदगानी …!!
दो  चार  दिनों  का  खेल  है  ये  
खेल  है  ये  जिंदगानी ….......…!!

पत्थर  की  मूरत  जग  भर 
तू  पत्थर  सा  बन  जा  रे …
ना  खून  बहे  ना  चींख  उठे 
तू  खंडर  सा  तन  जा  रे …
मन  पेड़  की  पाती  रोज़  चुघे …
तू  डाल  से  अब  उड़  जा  रे ……….!
ख़ामोश  खड़ी  हैं  जल  परियाँ
बस  नीर  है  ये  ज़िन्दगानी …........!
दो  चार  दिनों  का  खेल  है  ये  
खेल  है  ये  जिंदगानी ….......…!!

  
मंज़ूर  नहीं  तुझको  यम  घर 
अड़ी  मौत  से  तू  भिड़  जा  रे …
ना  रूह  कटे  ना  भीख  मिटे 
फिरे  वक़्त  से  तू  लड़  जा  रे …
रो  रो  मालिक  ख़ुद  आप  थके …
तू  हार  को  अब  हर  जा  रे  ……….!
तारीख़  चढ़ी  हैं  सब  घड़ियाँ 
बस  दौड़  है  ये  ज़िन्दगानी  …........!
दो  चार  दिनों  का  खेल  है  ये  …
खेल  है  ये  जिंदगानी ….......…!!

******* विक्रम  चौधरी ********

Friday, 27 April 2012

“ गंगा …..”




“ गंगा …..”

काहे  गंगा  में  जग  पाप  धुले 
काहे  धुले  ना  मन  का  शोर ...
रच  रच  गंगा  से  मैल  जुड़े
काहे  मिटे  ना  मन  का  चोर …
रे  बन्धु …….......................!
टांक  के  टीका  चल  पड़े …
चले  संत  बढ़ाई  ओढ़ …….....!!
 बन्धु  रे … बन्धु  रे …......!!
गल  डारें  चन्दन  की  माला 
मुख  भंजन  चहूँ  ओर ……......!
गल  डारें  चन्दन  की  माला 
भये  मुख  भंजन  चहूँ  ओर …...!!

ओ ...... बन्धु   रे ……………..!!
गंगा ……… में  काहे  रे ….......!!
जग  पाप  धुले  जग  पाप  धुले ..!!
काहे  धुले  ना  मन  का  शोर ……
बन्धु …. बन्धु  रे बन्धु बन्धु …!!

जपें  निरंतर  कासी  काबा ,
करें  धरम  का  भारी  दावा ..
पत्थर  पान  पे  खेस  ढकें ,
और  जात  पात  में  भेद  करें ..
पञ्च  भोग  नित  प्रभु  चढ़ें ,
बालक  टुक  भोजन  बाट  जुहें ..
नैम  वचन  धर  पूँजी  ढोवें ,
झूठ  करम  पर  जनम  को  रोवें ..
करें  ढोंगी  तप  घनघोर ……....!!
रे   बन्धु  ... टांक  के  टीका  चल  पड़े ,
चले  संत  बढ़ाई  ओढ़ …………………!!
ओ .. बन्धु   रे …..बन्धु   रे ….............!!

पहन  खड़ाऊ  केसरी  चोला ,
निकल  पड़े  भज  बम  बम  भोला ..
बाँध  भरम  की  मोटी  गठरी ,
बाँट  रहे  गोपिन  रस  हाला ..
पढ़े  जीभ  घुट  ज्ञान  की  बानी ,
रटे  ध्यान  मूरख  अज्ञानी ..
भाषण  में  बैरागी  छांया ,
ताक  रहे  मिल  कोमल  काया ..
नाहीं  मरे  रे  जी  का  खोट …….!!
रे   बन्धु  ... टांक  के  टीका  चल  पड़े ,
चले  संत  बढ़ाई  ओढ़ …………………!!
ओ .. बन्धु   रे …..बन्धु   रे ….............!!


************ विक्रम  चौधरी **************

Friday, 6 April 2012

" उड़ जा रे पंछी ..."
















" उड़  जा  रे  पंछी ..."

उड़  उड़  जा  रे  पंछी
चल  उड़  जा  रे ...
पंख  लगा  आकाश  उड़ा  रे 
पंछी  तेरे  संग ...
ना  दाना  ना  तिनका  पंछी 
चुघ  बदरा  के  रंग ...

रे  पंछी ... उड़  जा  रे .....
उड़  उड़  जा  रे  पंछी ......!

रैन  की  चिठिया  खोले  रे 
मन  धीर  के  धागे  तोड़े  रे 
अँखियन  भीतर  नींद  नाहीं 
सपन  करावे  जंग ...
पंछी  तेरे  संग ..............!

नीर  मरम  की  माटी  रे 
पलकन  पलकन  साथी  रे 
जीवन  तन  की  जीत  नाहीं 
करम  के  धागे  तंग ...
पंछी  तेरे  संग ..............!!

उड़  उड़  जा  रे  पंछी
चल  उड़  जा  रे ..............!!!

******* विक्रम  चौधरी ********

Saturday, 24 March 2012

" बोल बाला ......"

















" बोल बाला ......" 

शातिरों का बोल बाला    
बोतलों  का  शोर  साला  
चलता  है  नज़र  छुपा  के  
मंदिरों  में  चोर  काला  
नाक  में  नकेल  सी  है  
साँस  घुटती  बेबसी  है  
वक़्त  ये  उछल  पड़ा  है  
लग  रहा  है  मूहँ  पे  ताला ...!! 

चार  दिन  की  चाँदनी  को  सोचता  है  ज़िन्दगी  ..
जेब  है  फटी  मग़र  क्यों  गिनतियाँ  हैं  नोट  की  …
अज़ान  की  पुकार  सुन  के   
धड़कने  क्यों  तेज़  हैं  
क्यों  नकचढ़े  ईमान  पे  
बदलते  सबके  भेस  हैं  …

धड़  कटी  उमंग  शाला  
ढूंढें  बूँद  बूँद  हाला  …
बढ़ती  हक़  की  धूल  खोके  
बेड़ियों  पे  झूले  ताला

काट  के  पतंग  मेरी  ख़ुश  हुआ  ख़ुदा  कहीं ..
बरसा  बन  के  बादलों  सा  गरजा  फूँक  भर  नहीं ..
पड़ोस  का  मकान  बन  के 
मुझपे  क्यों  कलेश  है  
क्यों  सनसनी  के  गाल  पे  
तमाचा  अपना  देस  है  …. !!

******* विक्रम  चौधरी *********