
“ गंगा …..”
काहे गंगा में जग पाप धुले
काहे धुले ना मन का शोर ...
रच रच गंगा से मैल जुड़े
काहे मिटे ना मन का चोर …
रे बन्धु …….......................!
टांक के टीका चल पड़े …
चले संत बढ़ाई ओढ़ …….....!!
ओ बन्धु रे … बन्धु रे …......!!
गल डारें चन्दन की माला
मुख भंजन चहूँ ओर ……......!
गल डारें चन्दन की माला
भये मुख भंजन चहूँ ओर …...!!
ओ ...... बन्धु रे ……………..!!
गंगा ……… में काहे रे ….......!!
जग पाप धुले जग पाप धुले ..!!
काहे धुले ना मन का शोर ……
बन्धु …. बन्धु रे … बन्धु …बन्धु …!!
जपें निरंतर कासी काबा ,
करें धरम का भारी दावा ..
पत्थर पान पे खेस ढकें ,
और जात पात में भेद करें ..
पञ्च भोग नित प्रभु चढ़ें ,
बालक टुक भोजन बाट जुहें ..
नैम वचन धर पूँजी ढोवें ,
झूठ करम पर जनम को रोवें ..
करें ढोंगी तप घनघोर ……....!!
रे बन्धु … ४ ... टांक के टीका चल पड़े ,
चले संत बढ़ाई ओढ़ …………………!!
ओ .. बन्धु रे …..बन्धु रे ….............!!
पहन खड़ाऊ केसरी चोला ,
निकल पड़े भज बम बम भोला ..
बाँध भरम की मोटी गठरी ,
बाँट रहे गोपिन रस हाला ..
पढ़े जीभ घुट ज्ञान की बानी ,
रटे ध्यान मूरख अज्ञानी ..
भाषण में बैरागी छांया ,
ताक रहे मिल कोमल काया ..
नाहीं मरे रे जी का खोट …….!!
रे
बन्धु … ४ ...
टांक के टीका चल पड़े ,
चले संत बढ़ाई ओढ़ …………………!!
ओ .. बन्धु रे …..बन्धु रे ….............!!
************ विक्रम चौधरी **************
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