Thursday, 23 February 2012

" तलवार पुरानी ......"
















" तलवार  पुरानी ......" 

अब  होने  दो  तैयार  जवानी 
हाथ  में  लो  तलवार  पुरानी ...!
ख़तरे  में  अपना  ही  वतन  है 
ग़ैरों  का  अय्यार  जतन  है ...
डॉलर  को  देते  हो  सलामी 
छोड़ो  उधड़ी  ख़ाल  ग़ुलामी ...!!

नक्कालों  के  जाल  ने  निकलो 
सौदों  की  हड़ताल  से  निकलो 
बेइमानों  पर  ठोक  दो  ताला 
रिश्वत  पे  अब  तान  दो  भाला 
सरकारी  गोदाम  से  निकलो 
दल्लों  की  भरमार  से  निकलो ...
रपट  लिखाओ  उस  थाने  में 
जिधर  ना  ख़ाकी  फिरे  दिवानी  ... 
अब  होने  दो  तैयार  जवानी
हाथ  में  लो  तलवार  पुरानी ...!

दबा  हुआ  है  स्वर्ण  ख़ज़ाना 
भूचालों  अब  रंग  दिखाना 
जबरनदाज़ी  दौर  खुला  
अब  खेतों  में  है  बूचड़खाना ...

बेगारी  की  मार  से  निकलो 
बेकारी  की  हार  से  निकलो 
बिफ़र  पड़ी   खूंखार  बिमारी 
अहं  की  दस्तक  सब  पर  भारी ...

अब  छोड़ो  तंतर  ताल  मसानी 
पकड़  के  मारो  चोर  ईनामी ....
अब  होने  दो  तैयार  जवानी
हाथ  में  लो  तलवार  पुरानी ...!!

******* विक्रम  चौधरी *********

Wednesday, 22 February 2012

" बंदिशें ......"


















" बंदिशें ......"

बंदिशें  फिर  तमाम  थीं ..
मुझमें  हस्ती  नाक़ाम  थीं  ..
पर्दा  रोने  पे  किया  
बस  यही  शौक़  था  मेरा …
अपने  चेहरे  के  यकीं  पर  
शक्ल  जां  थी   …

आज  ना  होना  है  पूरा 
ना  अभी  आधे  में  जीना 
जो  मिला  इश्क़ - ए - मुक़द्दर 
वो  नज़र  थी  …

अश्क़  ने  बहना  है  छोड़ा 
है  अभी  ग़म  का  महीना 
जो  दुआ  दूर  थी  पल  भर 
वो  असर  थी  …

ग़ैर  नादान  था  थोड़ा
उसने  कुछ  भी  नहीं  छीना 
जो  दवा  थी  मेरे  घर  पर 
वो  ज़हर  थी  …

बंदिशें  फिर  तमाम  थीं ..
मुझमें  हस्ती  नाक़ाम  थीं  ....!!


**** विक्रम  चौधरी ****

Tuesday, 21 February 2012

" तीरथ तेरह तीन ......"
















तीरथ  तेरह  तीन ......"

मैं  साँच  पढूँ  और  झूठ  गढ़ूं ...
है  राम  नाम  का  दाम  खरा ...
ना  धीर  धरूँ  मैं  दान  करूँ ...
है  भेड़  चाल  का  गाम  हरा ....!
मैं  तीरथ  तेरह  तीन  करूँ ...
है  झोल  झाल  पे  मौन  धरा ...!!

बाँझिन  की  पीर  पे  जिन्न  अड़ा
हो  कैसे  अब  संतान  भला 
नारी  पे  नर  की  जीत  का  देखो 
खेल  ये  अपरम्पार  खड़ा .......!!


पैदा  हो  कर  माटी  से  तू 
माटी  से  ही  परहेज़  करे  
काग़ज़  के  फूल  पे  इत्र  छिड़क 
आँगन  को  तू  गुलरेज़  करे  
क्या  जुलम  कहूँ  इसे  वहम  कहूँ 
है  मस्त  इलाही  दूर  खड़ा .......!

मैं  तीरथ  तेरह  तीन  करूँ ...
है  झोल  झाल  पे  मौन  धरा ...!!


खोजे  खो  कर  अपनी  ख़ुशबू 
अपनी  ही  क़बर  तू  खोद  मरे  
दिखना  है  तुझे  क्यों  सबसे  अलग 
अल्लाह  की  तू  क्यों  होड़  करे  
मैं  ज़हन  सिलूँ  और  ठहर  जीयूँ
है  वक़्त  की  लत  में  दर्द  भरा .....!

मैं  तीरथ  तेरह  तीन  करूँ ...
है  झोल  झाल  पे  मौन  धरा ...!!

******* विक्रम  चौधरी *********

Sunday, 19 February 2012

" ढोर है लीला ..."
















ढोर  है  लीला ..."

मन  मोर  हठीला 
भीगे  रोज़  होवे  गीला ...
मदिरा  की  नगरी  में 
सब  ढोर  है  लीला ...!

ज़िन्दगी  खुला  तमाशा 
बिक  जाए  अच्छा  ख़ासा 
ढूँढे  अपनी  ख़बर 
पाके  मोड़  ज़रा  सा ...!

खाली  पड़ी  है  सुराही 
देखे  जग  की  हँसाई 
भरे  झूठा  ये  सबर 
बात  समझ  ना  आयी ...!

नाज़  करे  बेशरम 
भरे  चौखटे  का  दम   
माँगे  सबकी  नज़र
थोपे  मौला  पे  करम ...!

दुनियाँ  को  देके  झाँसा  
दिया  ख़ुद  को  दिलासा 
नखरों  की  मोजड़ी  में
ठोके  ज़ोर  ख़ुदा  का ...!

तोड़ा  राग  सुरीला 
आसमां  को  तूने  छीला 
आँधियों  की  चकरी  में 
डोले  चोर  रंगीला ....!

मन  मोर  हठीला
भीगे  रोज़  होवे  गीला ...
मदिरा  की  नगरी  में 
सब  ढोर  है  लीला ....!!

**** विक्रम  चौधरी ****

Wednesday, 8 February 2012

" मैं ......"



















" मैं ......"


मैं  गुना  नहीं  मैं  बुना  नहीं …
जा  कर  रब  घर  भी  छना  नहीं …
मन  भर  वैश्या  पे  छायी  हवस …
पर  पेट  से  आदम  जना  नहीं ….
  
मैं  दान  नहीं  वरदान  नहीं 
नीयत  से  भी  शैतान  नहीं 

मैं  दया  नहीं  मैं  दग़ा  नहीं 
मैं  हया  नहीं  मैं  बयां  नहीं
तप  कर  छोड़े  सब  दोष  ग़रज …
पर  राम  का  वानर  बना  नहीं ….

मैं  मौन  नहीं  आवाज़  नहीं 
हूँ  छाँव  मग़र  परवाज़  नहीं 

मैं  नफ़ा  नहीं  मैं  बिका  नहीं 
मैं  ख़ता  नहीं  मैं  दुआ  नहीं
बिन  बादल  बदरी  जाए  बरस ...
पर  आँगन  मेरा  खुला  नहीं .…

मैं  झूठ  नहीं  मैं  साँच  नहीं 
हूँ  राख़  मग़र  मैं  ख़ाक  नहीं 

मैं  बचा  नहीं  मैं  जला  नहीं 
मैं  हँसा  नहीं  मैं  लुटा  नहीं
जल  कर  कलयुग  भी  खाए  तरस ...
पर  जिन्न  का  वारिस  थमा  नहीं ....

मैं  पाप  नहीं  मैं  पुण्य  नहीं 
हूँ  गोल  मग़र  मैं  शून्य  नहीं 

मैं  धुला  नहीं  मैं  घुला  नहीं 
कारण  बिन  पूछे  चला  नहीं
मंदिर  मस्ज़िद  में  चढ़े  कनक …
पर  खेत  ये  बंजर  फ़ला  नहीं  …!!

******* विक्रम  चौधरी *********

Monday, 6 February 2012

" राजपुताना....."



















राजपुताना....."

राजपुताना  मूछ  है  भैया 
रेगिस्तानी  ऊँट  है  भैया  
अकड़  ना  इसकी  जाए  
रे  जिद्दी  सौ  सौ  गोते  खाए  …...

बालम  की  फटकार  ग़लत  है 
जूते  की  ललकार  विकट  है  …
रपट  ना  बैरी  खाए 
रे  उलटी  गिनती  मुझे  पढ़ाये ……

छोड़  चली  अब  नार  ग़ुलामी 
पड़  गयी  भारी   तोप  सलामी 
झपट  के  रोटी  खाए 
रे  तिरछे  नैना  कड़े  दिखाए  …..

ज़ालिम  की  तलवार  कलम  है 
हाक़िम  का  व्यापार  मरम  है 
रहम  ना  जी  पे  खाए
रे  खाता  अनपढ़  पे  चढ़  जाए  …..

नाक  के  सुर  में  नाग  है  भैया  
नक़द  से  हल्का  चाँद  है  भैया 
कमर  पे  लचके  खाए 
रे  बन्दा  मन  की  पुड़ी  बनाए  …..

******** विक्रम  चौधरी *********  

Wednesday, 1 February 2012

" बन्दानवाज़ी ....."



















बन्दानवाज़ी ....."

वल्लाह  ये  बन्दानवाज़ी  
अजनबी  है  ऐतराज़ी

चलना  शीशे  के  सहारे  हमको  मंज़ूर  नहीं 
अपनी  सूरत  के  इशारे  इतने  कमज़ोर  नहीं 
जितना  देखा  है  अभी  तक  तुमको  देखा  है 
मेरे  चेहरे  में  रफ़ीकों  ऐसी  कोई  बात  नहीं 

जीना  हमको  भी  है  साथी 
बाक़ी  मर्ज़ी  है  ख़ुदा  की 

उनके  हँसने  के  बहाने  हमने  ढूँढे  हैं  कई 
ग़म  के  दस्तूर  पुराने  हमने  भूले  हैं  कई 
इश्क़  सीधा  सा  है  मेरा  हमने  देखा  है 
दिल  दुखाने  के  तरीक़े  तुमने  सीखे  हैं  कई 
छोड़ो  एक  पल  को  उदासी 
वरना  दम  लेगी  ये  बाज़ी 

वल्लाह  ये  बन्दानवाज़ी
अजनबी  है  ऐतराज़ी ....!!

************ विक्रम  चौधरी ************