" नारी ....."
दुविधा कैसी है भारी
पड़ गयी अचरज में नारी
लज्जा के झूठे नाम पे लुटती
हर युग में बेचारी ...
सतयुग में राजा रंक हुआ
था वो दरिया दिल दानी
बिक गयी एक सेठ की चौखट पे
दुखियारी तारा रानी ...
त्रेता में वन का वास हुआ
कैकई ने की मनमानी
मर्यादा की ख़ातिर सीता ने
जलने की थी ठानी ...
द्वापर में छल का राज हुआ
पासों में उछली वाणी
द्रोपदि के चीर हरण पे था
सबकी आँखों में पानी ...
कलयुग में काल है अतरंगा
नारी का जिस्म है अधनंगा
कभी घूँघट में कभी बुर्खों में
कभी पश्चिम भेस के टुकड़ों में
सम्मान को ढकती नारी ....
कसती पौरुष के पिंजरे में
अबला असमत की मारी ...
लज्जा के झूठे नाम पे लुटती
हर युग में बेचारी ................!!
" विक्रम चौधरी "








