" तक़दीर फिर ......"
क्यों ना ये तक़दीर फिर
ख़ामोश हो कर चल पड़े …
चीर कर सिकुड़ी लक़ीरें
बात फिर से बन पड़े ......!
फ़ुर्सत से बैठे काल ने
जकड़ी हैं बाहें प्राण की
ना दम उगलते बन रहा
ना नब्ज़ ठहरे जान की ...!
अल्लहड़ भी है चितचोर है
ये आत्मा बे छोर है ..
निर्बल पे थोपे नियति
परमात्मा भी चोर है .......!
घुँघरू बजे चौराहों पर
ये भीड़ सुन कर थम पड़े
पल भर तमाशे के लिए
अब नौनिहाली कट पड़े …!
जीवन का हल मृत्यु में है
पर ज़िन्दगी घुड़दौड़ है …
ये इन्तेहाँ है सब्र की
कोशिश पे कसती डोर है ....!!
****** विक्रम चौधरी *******


