Friday, 18 July 2014

" क्या पता .... "















क्या  पता .... "

आँख  लग  जाने  से  पहले 
हम  हँसें  तुम  भी  हँसो ...!
शाम  ढल  जाने  से  पहले
हम  चलें  तुम  भी  चलो ...!!

क्या  पता  उस  ख़ाब  के  हाथों  से  हो  जाएँ  क़तल
क्या  पता  रातों  में  रास्ता  पाँओ  से  जाए  फिसल
जेब  के  कोने  सिलो
देखो  जहाँ  भी  छेद  हो
बेवजह  खोलो  ना  मुट्ठी
चाहे  जितनी  रेत  हो

चील  के  तकने  से  पहले
हम  उठें  तुम  भी  उठो ...!
साँस  फट  जाने  से  पहले
हम  लड़ें  तुम  भी  लड़ो ...!! 

क्या  पता  उस  घाव  के  टुकड़े  से  बन  जाए  ग़ज़ल
क्या  पता  फिर  ज़िन्दगी  आ  जाए  घर  मौज़ू  बदल 
ज़ेर  को  ज़िन्दा  रखो
मुश्क़िल  भले  ही  जीत  हो
तैश  के  काँधों  से  उतरो
इल्म  जब  ख़ुर्शीद  हो

आँख  लग  जाने  से  पहले 
हम  हँसें  तुम  भी  हँसो ...!
शाम  ढल  जाने  से  पहले
हम  चलें  तुम  भी  चलो ...!!


"" विक्रम  चौधरी ""

मौज़ू - विषय
ज़ेर= हारा हुआ
ख़ुर्शीद - सूर्य

Saturday, 5 July 2014

" काल का बटका ...."
















" काल  का  बटका ...."

काल  का  बटका  भर  के  बोली
पीतल  की  दो  सूंत  की  गोली
लाल  करें  कुछ  सर्द  हवाएँ
आओ  चलो  मिल  खेलें  होली ...!!

जिद  मरी  जीत  की  परी
इत  मरी  कुछ  उत  मरी
साथ  लिए  कुछ  माँस  के  टुकड़े
उछल  के  मेरे  द्वार  पड़ी .......!!

गुंचा  गुंचा  बाग़  उजाड़े
बरगद  के  दो  वृक्ष  उखाड़े
मानवता  के  बोल  वचन  ने
मानव  के  अरमान  बिगाड़े ......!!

देख  सजन  अन्धों  की  टोली
काणे  ने  पहनी  तंग  चोली
खेल  रहा  गंभीर  कलाएं
भरे  निरंतर  खाली  झोली ......!!

***** विक्रम  चौधरी *****