“ खोज ना
तू पाए ...”
नैन के
अस्सी रंग छुपा
के
डाल के
ऐनक बंदा भागे
देख रहा
जो दुनियाँ में
वो
देख ना
तू पाये ....
काल से
अपनी चाल बचा के
बेफ़िकरों पे
जाल बिछा के
खोज रहा
जो सूरत में वो
खोज ना
तू पाये ....!!
रे बंदा
बंद गली का चोर
रे काटे
बिन पतंग ये डोर
...!!
खौलते पानी
को कर दे
वो ठण्डा सा
धुआँ
बोलते इन्सां
को कर दे
एक पल में
बेज़ुबां
रंग बदल
के रात का
वो ले जाए
चन्द्रमा
नाप दे
गज भर के
फीते से सारा
आसमां
धूप के
पथ में छाँव
बसा के
बन्जर वन
को गाँव बता के
खौंस रहा
जो इन्सां
से वो
खौंस ना
तू पाए ....!!
रे बंदा
बंद गली का चोर
रे काटे
बिन पतंग ये डोर
...!!
“ विक्रम चौधरी ”









