Sunday, 19 October 2014

" सैयाँ बड़ा बेईमान ...."

















" सैयाँ  बड़ा  बेईमान ...."

सखी  मोरा  सैयाँ  बड़ा  बेईमान
डारे  नजर  नाहीं  जाए  रे  जान ...!!

खनक  सी  भरे  रे  हियरा
पनघट  पे  शाम ...
रात  की  नथ  पे  उतरा  है  चाँद ...
घुँघरू  पायलिया  के  रुनझुन  रुनझुन
बिरहा  के  मद  में  गावें  सजन  धुन ...

धरे  ना  पिहरवा  अँसुअन  पे  कान
सखी  मोरा  सैयाँ  बड़ा  बेईमान ....!!

भरम  सौ  करे  रे  पुरवा
जपै  तोरा  नाम ...
मन  की  अगन  क्यों  जाने  ना  राम ...
पिया  की  लगन  में  खोये  बैठी  सुध  बुध
लागे  नाहीं  मनवा  बन  गयी  मैं  तो  बुत ...

करो  ना  साँवरिया  मोहे  बदनाम
सखी  मोरा  सैयाँ  बड़ा  बेईमान ......!!


******* विक्रम  चौधरी ********

Monday, 6 October 2014

" खानाबदोशी ....."


















" खानाबदोशी ....." 

जीने  के  हर  अंदाज़  में  है  सरफ़रोशी  
माँगी  थी  आज़ादी  मिली  खानाबदोशी 

माँगी  थी  ज़िल्लत  से  परे  घर  घर  में  रोटी 
मिल  गयी  तख्तों  से  उतरी  खूं  की  बोटी 

एक  तरफ़  डेमोक्रेसी  के  फंदे  में  गरदन  फँसी 
एक  तरफ़  रोज़ी  के  लफड़ों  में  हुयी  है  ख़ुदकुशी 

ये  रपट  जा  करके  किस  थाने  में  अब  लिखवाएँ  हम 
सरकार  को  चुप  देख  कर  गूँगों  को  आती  है  हँसी 

बात  ये  भी  कल  के  एक  अखबार  में  छप  जायेगी 
और  दादी  माँ  भी  उस  पर  रख  चने  फिर  खायेगी 

लाज़मी  है  तयबाज़ारी  पर  यहाँ  जूताकशी 
पूँजीपतियों  और  नेताओं  में  है  रस्साकसी 

आओ  जनता  को  भी  पहना  दो  ज़रा  चश्मा  नया 
हम  ही  हैं  क़त्ल - ए - वतन  ना  होने  दो  इसको  बयां 

मरने  के  इस  एहसास  में  है  कौन  दोषी 
माँगी  थी  आज़ादी  मिली  खानाबदोशी ......!!


"" विक्रम  चौधरी ""
  

Wednesday, 24 September 2014

" बशर नये ...."















" बशर  नये ...."

क़ातिलों  को  मिल  गए  बशर  नये
मिल  गए  दरिन्दों  को  शहर  नये ...!

किसका  इंतज़ार  कर  रहे  हो  तुम  बताओ  तो 
सामने  हैं  खिलखिलाहटें  उन्हें  सताओ  तो 

काट  लो  या  खौंस  लो
हँसी  को  लब  से  नौंच  लो
गोस्त  जो  पड़ा  ज़मीन  पर  
उसे  भी  पौंछ  लो 

बिगड़े  हाल  का  मज़ाक  तुमने  भी  उड़ा  लिया
सोते  पंछी  का  घरौंदा  हमने  भी  चुरा  लिया ...
झूठ  के  लिबास  को  तुमने  आज़मा  लिया
सत्य  के  लिहाफ़  का  हमने  ख़ातमा  किया ….
 
जीतने  में  देर  हम  भी  क्यों  करें
मर  गए  हैं  थोड़ा  थोड़ा  और  मरें ...
  
क़ातिलों  को  मिल  गए  बशर  नये
मिल  गए  दरिन्दों  को  शहर  नये ....!!


"" विक्रम  चौधरी ""

" साँचा नाम ....."












" साँचा  नाम ....."

फैंको  झूठी  बोलियाँ
लेके  साँचा  नाम ...!
चाहे  तो  अल्लाह  कहो
या  बोलो  सिया  राम ....!!

भीतर  भीतर  एक  हैं
मानस  के  हर  काम
फिर  काहे  को  बँट  गए
टुकड़ा  टुकड़ा  गाम ....!!

पेट  भरे  की  नियति
कर  बैठी  संग्राम
क़तरा  क़तरा  ख़ून  का
खोजे  तन  की  छाओं ....!!

दानव  ओढ़े  चूनरी
डोल  रहा  सब  धाम
घर  घर  जाके  माँग  रहा
भिक्षा  में  विश्राम .......!!


"" विक्रम  चौधरी ""

Friday, 18 July 2014

" क्या पता .... "















क्या  पता .... "

आँख  लग  जाने  से  पहले 
हम  हँसें  तुम  भी  हँसो ...!
शाम  ढल  जाने  से  पहले
हम  चलें  तुम  भी  चलो ...!!

क्या  पता  उस  ख़ाब  के  हाथों  से  हो  जाएँ  क़तल
क्या  पता  रातों  में  रास्ता  पाँओ  से  जाए  फिसल
जेब  के  कोने  सिलो
देखो  जहाँ  भी  छेद  हो
बेवजह  खोलो  ना  मुट्ठी
चाहे  जितनी  रेत  हो

चील  के  तकने  से  पहले
हम  उठें  तुम  भी  उठो ...!
साँस  फट  जाने  से  पहले
हम  लड़ें  तुम  भी  लड़ो ...!! 

क्या  पता  उस  घाव  के  टुकड़े  से  बन  जाए  ग़ज़ल
क्या  पता  फिर  ज़िन्दगी  आ  जाए  घर  मौज़ू  बदल 
ज़ेर  को  ज़िन्दा  रखो
मुश्क़िल  भले  ही  जीत  हो
तैश  के  काँधों  से  उतरो
इल्म  जब  ख़ुर्शीद  हो

आँख  लग  जाने  से  पहले 
हम  हँसें  तुम  भी  हँसो ...!
शाम  ढल  जाने  से  पहले
हम  चलें  तुम  भी  चलो ...!!


"" विक्रम  चौधरी ""

मौज़ू - विषय
ज़ेर= हारा हुआ
ख़ुर्शीद - सूर्य

Saturday, 5 July 2014

" काल का बटका ...."
















" काल  का  बटका ...."

काल  का  बटका  भर  के  बोली
पीतल  की  दो  सूंत  की  गोली
लाल  करें  कुछ  सर्द  हवाएँ
आओ  चलो  मिल  खेलें  होली ...!!

जिद  मरी  जीत  की  परी
इत  मरी  कुछ  उत  मरी
साथ  लिए  कुछ  माँस  के  टुकड़े
उछल  के  मेरे  द्वार  पड़ी .......!!

गुंचा  गुंचा  बाग़  उजाड़े
बरगद  के  दो  वृक्ष  उखाड़े
मानवता  के  बोल  वचन  ने
मानव  के  अरमान  बिगाड़े ......!!

देख  सजन  अन्धों  की  टोली
काणे  ने  पहनी  तंग  चोली
खेल  रहा  गंभीर  कलाएं
भरे  निरंतर  खाली  झोली ......!!

***** विक्रम  चौधरी *****


Friday, 27 June 2014

" बम बम अली शंकर ...."











" बम  बम  अली  शंकर ...."

बम  बम  अली  शंकर
अगड़  बम  बम  अली  शंकर ...!!

बैर  भूत  परवान  चढ़ा  दे
कुण्ठा  को  श्मशान  दिखा  दे
निश्छल  निर्मल  बहते  जल  में
मार  ना  तू  कंकर  ..............!
बम  बम  अली  शंकर ...........!!

एक  हाथ  रख  शंखनाद 
रख  एक  हाथ  में  बूटी
अलख  निरंजन  साँच  सुबक  ले
बाक़ी  बात  है  झूठी
जंगल  जंगल  बिछा  के  मंगल
मार  ना  तू  मंतर ................!
गंगा  में  रोज़  नहाने  से 
ना  होगा  तू  सुन्दर ..............!
बम  बम  अली  शंकर ...........!!

पूरे  पथ  का  बन  जा  तू  पथिक
आधे  में  नहीं  रहबर .....
सुलगे  ग़र  तन  तो  डाल  भसम
फूलों  में  छुपे  खंजर ......
आनन्द  अनंत  की  भूख  हुआ 
मानस  भी  हुआ  बन्दर .........!!
बम  बम  अली  शंकर ...........!!

****** विक्रम चौधरी *******

Wednesday, 18 June 2014

" हू ...."
















" हू ...."

मेरे  अंदर  हू  है 
तेरे  अंदर  हू
मेरा  मुझमें  साईयाँ
मैं  यार  क़लन्दर  हू ....!!

मेरे  अंदर  हू  है 
तेरे  अंदर  हू .............!!

काटे  ते  ना  कटे
रूह  की  बेड़ी  जां  तले ..!
छोड़े  ना  पीछा  चले  पीछे
जहाँ  तन  जले ...!!

चुघे  घट  घट  कालजा
ना  मिटे  मंजर  हू
मेरे  अंदर  हू  है 
तेरे  अंदर  हू .............!!

देखे  चौबारा  फिर  दोबारा
जान  बन  पले .....!
फिरे  रे  राही  मारा  मारा
साँस  बंद  पड़े .....!!

चुने  चिड़ियाँ  घौंसला 
ना  थमे  अंधड़  हू
मेरे  अंदर  हू  है 
तेरे  अंदर  हू .............!!


*** विक्रम  चौधरी ***

Saturday, 31 May 2014

" बुल्लेया ...."




















" बुल्लेया ...."

बुल्लेया  की  तस्वीर  बणावे
बण  जावे  ते  आप  मिटावे .....!
हथ्थ  खँजरी  ते  लब  ते  कलमा
पढ़  जावे  ते  ख़ाक  उड़ावे ......!!

जोगी  वाला  भेस  बणावे
रम  जावे  ते  राग  सुणावे ......!
छड  जिन्दड़ी  ते  छड  के  मजमा
छुप  जावे  ते  कोल  ना  आवे ....!!

ओक्खे  जी  दा  हाल  बतावे
रो  जावे  ते  नैंण  चुरावे .........!
कर  वालियां  दा  सोणा  सजदा 
सर  माथे  ते  राख  चढ़ावे ....!!

******* विक्रम  चौधरी *********

Sunday, 18 May 2014

" दर्द ना तुमको होता है ...."


















" दर्द  ना  तुमको  होता  है ...."

कैसी  दो  रंग  भरी  सीरत  आकाश  तले  रहती  है
चाँदी  की  चन्द  दुकानों  में  चुपके  से  वो  बिकती  है ....!!

जिस्मों  का  सौदा  खोल  के  चादर  होता  है
इन्सान  की  चुप्पी  पर  इन्सान  ये  रोता  है

फटता  है  कलेजा  मेरा
पर  दर्द  ना  तुमको  होता  है .....!!

पंछी  भी  अपने  जीव  की  ज़िम्मेदारी  जम  के  ढोता  है
पर  आदम  के  आईने  में  चेहरा  कुछ  और  ही  होता  है

जब  धूप  में  जलते  मासूमों  के  पाँओ  में  छाला  पड़ता  है
जब  आँसू  आँख  से  बह  कर  उसके  होंठ  पे  आकर  रुकता  है

फटता  है  कलेजा  मेरा
पर  दर्द  ना  तुमको  होता  है .....!!




मैली  सूरत  को  देख  के  गाड़ी  के  शीशों  का  उठ  जाना
दो  सिक्के  भीख  में  दे  करके  सीने  का  चौड़ा  हो  जाना
कीचड़  से  दूर  रहो  कह  कर  रूमाल  का  मुहँ  तक  आ  जाना
अबला  की  लुटती  लाज  पे  आँखें  फेर  के  आगे  बढ़  जाना

आता  है  तुम्हे  और  मुझको  भी 
अंग्रेज़ी  बोल  के  मुस्काना
भारत  को  पिछड़ा  कह  कर  के
आता  है  सभी  को  चिल्लाहना

जो  कुचला  सा  एक  फूल  सड़क  पर  सहमी  साँसें  भरता  है
हममें  से  किसी  माँ  की  मुर्दा  उस  कोख  का  ही  वो  हिस्सा  है
शायद  उसकी  छाती  से  दूध  नहीं  कुछ  और  ही  बहता  है

फटता  है  कलेजा  मेरा
पर  दर्द  ना  तुमको  होता  है .....!!


***** विक्रम  चौधरी ******

Saturday, 17 May 2014

" जमूरा ....."


















" जमूरा ....."

जमूरा  खेल  की  मस्ती  में  दीवाना
सिखाये  भीड़  के  सिक्कों  पे  मर  जाना ....!!

किसी  की  बाँध  कर  आँखें
किसी  की  थाम  कर  साँसें

किसी  के  होंठ  पर  हँस  के
किसी  की  बात  में  बस  के

वो  उछले  ढोल  की  थपकी  पे  मस्ताना ....!
जमूरा  खेल  की  मस्ती  में  दीवाना
सिखाये  भीड़  के  सिक्कों  पे  मर  जाना ....!!

धुँए  की  डोर  वो  पकड़े
कभी  डोरी  पे  जां  अटके
बजे  ताली  तो  उसका  दिल
ख़ुशी  में  ज़ोर  से  धड़के

ये  कैसा  खेल  है  मौला
खिलाड़ी  का  फ़ना  होना
लड़े  अपने  ही  फ़न  से
जिस्म  के  हिस्सों  का  हर  कोना ....!!

जमूरा  डुगडुगी  की  ताल  का  शाना
बिछाए  मौत  के  बिस्तर  पे  सिरहाना ....!!

जमूरा  खेल  की  मस्ती  में  दीवाना
सिखाये  भीड़  के  सिक्कों  पे  मर  जाना ....!!


*********** विक्रम  चौधरी ************

Wednesday, 14 May 2014

" सत्य जाने कौन है ....."
















" सत्य  जाने  कौन  है ....."

बूँद  बूँद  भर  के  अब  थक  गया  वियोम  है
ना  भरी  ये  ज़िन्दगी  घटता  घटता  रोम  है ...!!
युद्ध  की  ज़मीन  का  ना  कोई  विलोम  है
सत्य  के  समूल  में  सत्य  जाने  कौन  है .....!!

बशर  बशर  का  फ़ासला 
अपने  हाल  ही  बुना 
भरोसा  अपने  हाथ  का
अपने  हाथ  ही  धुना 

ना  बशर  के  बस  में  था
बख्शना  ग़ुनाह  को 
ना  था  बस  में  उसके 
बख्शना  ही  अपने  आप  को 

ना  उसे  सुधार  कर , निखारता  कोई  यहाँ 
ना  उसे  सँवार  कर  , निहारता  कोई  यहाँ  
ना  कोई  उसे  उसी  के  नाम  की  पुकार  दे
ना  उसे  वो  मौसिक़ी  की  रौशनी  उधार  दे 

सब  यहाँ  खड़े - खड़े  तमाशबीन  हो  गए
चीर  फाड़  करके  गोस्त  में  वो  लीन  हो  गए 

स्वाद  आ  रहा  बशर  की  उँगलियों  को  देख  लो 
जीत  का  जमूरा  कह  रहा  पतंगें  बीन   लो 

बात  बात  पर  बजा  है  शख़्श  देखो  ढोल  है
रात  भर  जला   जो  उसका  कतरा  कतरा  खोल  है 

बूँद  बूँद  भर  के  अब  थक  गया  वियोम  है
ना  भरी  ये  ज़िन्दगी  घटता  घटता  रोम  है ...!!
युद्ध  की  ज़मीन  का  ना  कोई  विलोम  है
सत्य  के  समूल  में  सत्य  जाने  कौन  है .....!!


************ विक्रम  चौधरी ************

" जाने कौन ख़ुदा है ..."















" जाने  कौन  ख़ुदा  है  ..."

भूख़  मरे  ना  मरे  दिलासा
कटे  हैं  खुर  क्यों  कटे  ना  फाँका ...
आधी  आधी  रात  चन्द्रमा
चील  को  ठौर  दिखाए
मानस  मन  से  घिरा  सोच  में
दूर  खड़ा  ललचाये ........!!

कौन  दुःशासन  है  जग  माहीं
जाने  कौन  भला  है
बंद  करो  सब  खुली  किवाड़ी
पग  पग  चोर  खड़ा  है
राम  कहीं , कहीं  नाम  है  अल्लाह
देखो  बशर  जुदा  है

इधर  ख़ुदा  है  उधर  ख़ुदा  है
कैसी  घोर  सुलह  है ............!!
मोह  माया  से  लड़े  आत्मा
जाने  कौन  ख़ुदा  है ............!!

एक  है  सूरत  ऐनक  सौ
हर  ऐनक  बने  मदारी
आँखें  तक  हैरां  ना  हों
मारे  जब  जीभ  गुलाटी

लगी  दीन  को  ठोकर  कस  के
देखो  असर  हुआ  है
चीर  कलेजा  मन  का  पंछी
जाने  कहाँ  उड़ा  है
पनहारी  का  देख  तमाशा
पनघट  गरज  उठा  है

मोह  माया  से  लड़े  आत्मा
जाने  कौन  ख़ुदा  है ............!!

***** विक्रम  चौधरी *****

" बाग़ी ....."
















" बाग़ी ....."

आकाश  गिरा  मौला
धरती  घर  छोड़  के  भागी
शैतान  के  जुमलों  पर
इन्सान  हुआ  है  बाग़ी ....!!

क़ातिल  है  मेरी  नीयत  की  छुरी
कोई  मुझको  क़ैद  करा  दे
मुझसे  है  बुरी  फ़ितरत  ये  मेरी
कोई  मुझसे  मुझे  छुड़ा  दे
काठी  है  मेरी  शैया  पे  रखी
कोई  मुझको  आग  दिखा  दे ....!!

मैं  खोद  के  दुःख  फिर  दर्द  कहूँ
मैं  बाँट  के  ख़ुद  को  फ़र्क़  करूँ
सीरत  के  उजले  दामन  पर
मैं  रात  से  ग़हरा  दाग़  रखूँ

मैं  आप  ख़ुदा  मैं  आप  बशर
मैं  आप  निजाद  मैं  आप  नज़र
क़ाफ़िर  है  मेरी  ये  भूख़  बढ़ी
कोई  मन  की  भूख़  मिटा  दे
काठी  है  मेरी  शैया  पे  रखी
कोई  मुझको  आग  दिखा  दे ....!!

मैं  रावण  दाँत  का  पेट  भरूँ
मैं  हार  की  मैय्यत  देख  डरूँ
पुरवा  की  शीतल  आहट  पर
मैं  ग़र्द  के  बादल  डाल  मरूँ

मैं  आप  दुआ  मैं  आप  क़हर
मैं  आप  इलाज  मैं  आप  ज़हर
डायन  है  मेरी  इच्छा  की  परी
कोई  इसके  पंख  कटा  दे
काठी  है  मेरी  शैया  पे  रखी
कोई  मुझको  आग  दिखा  दे ....!!

आकाश  गिरा  मौला
धरती  घर  छोड़  के  भागी
शैतान  के  जुमलों  पर
इन्सान  हुआ  है  बाग़ी ....!!

**** विक्रम  चौधरी ****

" रंगशाला ....."














" रंगशाला ....."

पृथ्वी  के  अधरों  पर
जीवन  की  है  रंगशाला ...
क़िरदार  में  मानव  के
कोई  चित्र  दिखा  है  काला ...!!

लाओ  तराज़ू  तौलें
आधे  पूरे  और  पौने
रह  जाएँ  ना  कुचले  मसले
ना  छोड़ो  कद  के  बौने ....

आधार  अलग  व्यापार  अलग
जीने  के  भी  संसार  अलग
बदलें  रग़  में  बहती  धारा
बच्चों  के  तंग  बिछौने
छोड़ें  दुखियों  को  रोने
लाओ  तराज़ू  तौलें ........!!

पृथ्वी  के  अधरों  पर
जीवन  की  है  रंगशाला ...
क़िरदार  में  मानव  के
कोई  चित्र  दिखा  है  काला ...!!

कुण्ठा  में  दफ़न  मासूम  ज़हन
काँटों  की  पकड़  में  है  धड़कन
रख  दो  सूली  पे  तन  सारा
दौड़ें  चल  जाल  बिछाने
बाँधें  नदिया  के  कोने
लाओ  तराज़ू  तौलें ........!!

पृथ्वी  के  अधरों  पर
जीवन  की  है  रंगशाला ...
क़िरदार  में  मानव  के
कोई  चित्र  दिखा  है  काला ...!!

***** विक्रम  चौधरी *****

" नदिया ...."















" नदिया ...."

नादिया  से  करूँ  मैं  सवाल
पूछे  नाहीं  मोसे  मोरा  हाल ... !!

बहे  क्यों  अकेली  छोड़  के  मोहे 
बने  ना  सहेली  जोड़  के  मोहे 
खींचे  नित  पुरवा  के  बाल .....!!

अंग  लगाए  नाव  के  अंग  से 
सुने  तू  मेघ  मल्हार
माझी  के  संग  संग  सुर  मिलाये
रीझे  तू  करके  श्रृंगार ...

करे  क्यों  ठिठोली  छेड़  के  मोहे
बनूँ  मैं  पहेली  झेल  के  तोहे ...
बीते  दिन  करके  मलाल ……!!

चींखे  री  मन  का  बैरी  मयूरा
आधी  आधी  रात
चाँद  की  गोद  में  बैठ  नहाये
तेरी  सब  सौगात ...

भरे  रे  हिलोरी  हेज  के  मोहे
करे  जोरा  जोरी  खेल  के  मोहे
छूए  नाहीं  रुख़े  मोरे  गाल ......!!


******** विक्रम  चौधरी *******

" अजी हाँ हाँ ...."

















" अजी  हाँ  हाँ ...."

हक़  भरे  आँसू  और  ख़ाब  के  टुकड़े
रोते  चिल्लाहते  मासूम  जान  के  मुखड़े ...!!

निकले  नश्तर  से  तीरों  का  है  ठिकाना  क्या
छलनी  सीने  का  होना  भी  है  दिखाना  क्या ...!!

हर  दिन  देखा  है  खुद  को
हाथों  की  लक़ीरों  में
कभी  मिटते  कभी  बनते
इरादों  के  ज़ख़ीरों  में ...!!

गिरते  देखा  है  खुद  को
आँखों  के  जज़ीरों  में ...!!

अपने  कानों  पर  पड़ती
आवाज़ें  अपनी  ही  तो  हैं
अपने  काँधों  पर  सजती
दुकानें  अपनी  ही  तो  हैं ...!!

ख़ुद  ही  बेचो  ख़ुद  ख़रीदो
तक़िये  से  नींदों  को  खींचो
चंगुल  में  फँसा  के  दाना
उड़ते  पंछी  को  दबोचो ...!!

इसी  काम  का  तज़ुर्बा  करो  अजी  हाँ  हाँ ....
बागड़  बिल्लों  की  ज़ुबानी  सीखो  जी  हाँ  हाँ  हाँ ....!!


************ विक्रम चौधरी *************

Tuesday, 13 May 2014

" मन्त्र ....."
















" मन्त्र ....." 

तिलिस्म  है  ना  जादू , ना  तंत्र  है 
क्या  है  ये  कारवाँ  ज़िन्दगी 
कैसा  मन्त्र  है  ....२ ..!!

बिना  पानी  के  है  गीला 
रंग  बिना  है  रंगीला .....!

झूठा  है  सच्चा  है  
थोड़ा  सा  कच्चा  है 
बढ़ती  उम्र  में  भी  
जाने  क्यों  बच्चा  है .....!!

क्या  है  ये  कारवाँ  ज़िन्दगी 
कैसा  मन्त्र  है  ....२ ..!!

चढ़ता  है  ख़ुद  अपनी  सीढ़ी  पे 
मैं  क्यों  पीछे  हूँ  मुझसे  कहता  है 
कसता  है  मुझको  यूँ  बेड़ी  में 
मैं  क्यों  बँधा  हूँ  मुझसे  कहता  है …..!!

कूचा - कूचा  चलता  हूँ  
गिरता  हूँ  सम्भलता  हूँ 
दौड़ता  है  वो  क्यों  पीछे  पीछे  मेरे 
हाथ  में  लिए  पत्थर  क्यों  रहता  है .....!!

खोद  कर  रखता  है  एक  नयी  क़ब्र  वो 
छेड़ता  है  मेरे  अनछुए  सब्र  को ..........!!

खींचता  है  मेरे  पाँव  से  वो  ज़मीं 
देखता  है  मेरी  आँख  में  जब  नमी ....!!

ना  रोने  देता  है  ना  हँसने  देता  है ....!

क्या  है  ये  कारवाँ  ज़िन्दगी 
कैसा  मन्त्र  है  ....२ ..........!!  

**** विक्रम  चौधरी ****

" रोती कलम ....."

















" रोती  कलम ....."

अल्फ़ाज़  के  हालात  पर
रोती  कलम  देखो ..........!
जिसको  नहीं  बाँटी  अक़ल
उसकी  शक़ल  देखो ........!!

उतरे  हैं  काग़ज़  पर 
हक़ीक़त  झूठ  फिर  एक  साथ  ही
किसको  कहें  ज़ालिम 
भला  किसको  कहें  हम  सादगी ...!

हाक़िम  की  हर  आवाज़  पर
ताली  ज़रा  फैंको .......!
जिसने  किये  छुप  कर  क़तल
खुल  कर  रहम  देखो ......!!

हमने  भी  अपने  दिल  को
समझाया  कहा  सोचो ....!
कुछ  तो  ज़माने  की 
क़रामातों  को  तुम  सीखो ...!!

अल्फ़ाज़  के  हालात  पर
रोती  कलम  देखो ..........!
जिसको  नहीं  बाँटी  अक़ल
उसकी  शक़ल  देखो ........!!


****** विक्रम  चौधरी ******