" सरफिरी तमन्ना ......"
जूते पहन के नकली सड़कों पे भागती है ...
मेरे जिस्म को सजा कर कलेजा चाखती है ...
मेरी अन्जुमन की शह ने मुझको ही मात दी है ...
मेरी सरफिरी तमन्ना सचमुच ही बावरी है ...........!!
वो जानती नहीं है थमना भी लाज़मी है ...
ग़र है ज़हर जहां तो आबेहयात भी है ...
बूढ़ों के सर की छत का साया तैनात भी है ...
पर नासमझ वो मेरा ही ग़म उछालती है ...
मेरी सरफिरी तमन्ना सचमुच ही बावरी है ...........!!
ये चाँदनी में सर के बालों को काढ़ती है ...
बिल्ली को दूध दे कर चूहों को पालती है ...
पक्षी को दे के दाना मुर्गों को काटती है ...
रस्ता बदल बदल कर दहशत ये बाँटती है ...
हो आसतीन ऐसी जो साँप से परे हो ...
जैसे कि टूटा पत्ता फिर शाख़ से जुड़ा हो ...
लेकिन वो धूल बन कर चेहरों को ढांपती है ...
तीतर का गोश्त खा कर मेरा दम उबालती है ...
मेरी सरफिरी तमन्ना सचमुच ही बावरी है ...........!!
वो जानती नहीं है कम्सिन ये नाज़नीं है ...
घर में लगा के बिस्तर ये घर उजाड़ती है ...
मेरी सरफिरी तमन्ना सचमुच ही बावरी है ...........!!
ये नौकरी में हफ़्ते रिश्वत के माँगती है ...
बेहूदे चुटकुलों पर हँस हँस के हाँफती है ...
मंगतों को भूख दे कर भूखों को फाँकती है ...
सच्चों की बेईज्ज़ती पर खुद को निहारती है ...
लिखो कोई कहानी जो अंत से परे हो ...
जैसे कि रोता बच्चा फिर मुस्कुरा पड़ा हो ...
लेकिन वो दर सुखन का काँटों से झाड़ती है ...
ममता की मुफ़्लिसी पर आँचल को फाड़ती है ...
मेरी सरफिरी तमन्ना सचमुच ही बावरी है ...........!!
वो जानती नहीं है मौसम ये आख़िरी है ...
बिन बारिशों के बादल को वो दुलारती है ...
मेरी सरफिरी तमन्ना सचमुच ही बावरी है ...........!!
************** विक्रम चौधरी *****************


