Sunday, 30 March 2014

" घरौंदा ला ...."

















" घरौंदा  ला ...."

जा  उस  पंछी  का  घरौंदा  ला 
जिसमें  दाने  तिनके  हों
बच्चे  नींद  में  सोये  हों
पैदा  वो  दो  दिन  के  हों ...

माँ  उनकी  ना  देख  रही  हो 
शाम  का  चुग्गा  खोज  रही  हो ...

ऐसी  जुगत  तू  करके  ला
अपनी  खुदी  से  लड़  के  ला ...

जा  उस  पंछी  का  घरौंदा  ला ....!!

जा  उस  नन्ही  का  बिछौना  ला
जिसमें  हूर  के  मनके  हों
सच्चे  लाड  में  पलती  हो 
जो  लोरी  सुन  के  सोती  हो ...

माँ  उसकी  पनघट  पे  गयी  हो 
काठ  का  गुड्डा  ढूँढ  रही  हो ...

ऐसी  जुगत  तू  करके  ला
अपनी  नज़र  से  बच  के  ला ....

जा  उस  पंछी  का  घरौंदा  ला ....!!


******* विक्रम  चौधरी *******

    

Saturday, 29 March 2014

" अल्फ़ाज़ हुए हल्के ...."















" अल्फ़ाज़  हुए  हल्के ...."

मौला  ने  दी  ज़ुबां
ज़ुबां  क्या  काम  आयी ....!
इन्सां  के  सगे  इन्सां  ने
तोहफ़े  में  बुरी  सज़ा  पायी ....!! "

कैसे  बाँटूँ  क्या  परोसूँ
टोकूँ  खुद  को  ही  कोसूँ
अल्फ़ाज़  हुए  हल्के .............!!

गए  लहज़े  से  फिसल
गिरे  होठों  से  निकल
बेवक़्त  ही  ये  छलके

अल्फ़ाज़  हुए  हल्के .............!!

पाल  कर  चली  बुराई
मन  से  अहम्  की  लड़ाई
कच्चे  कान  हुए  दिल  के

अल्फ़ाज़  हुए  हल्के .............!!

छोड़ो  रंगों  की  रंगीनी
पानी  में  ख़ुशबू  है  भीनी
गंगा  नहान  करो  मिलके

अल्फ़ाज़  हुए  हल्के .............!!

खींचातानी  है  बलाकी
जानी मानी  है  चालाकी
बँधे  हाथ  खुले  सबके

अल्फ़ाज़  हुए  हल्के .............!!

टूटा  चोरों  का  ये  ताँता
मुख़बिर  हुआ  है  सन्नाटा
सीखो  मोल  ये  जीवन  के

अल्फ़ाज़  हुए  हल्के .............!!

गए  लहज़े  से  फिसल
गिरे  होठों  से  निकल

अल्फ़ाज़  हुए  हल्के .............!!


*** विक्रम  चौधरी ***



  

" नया दंगा ....."

















" नया  दंगा ....."

पते  की  बात  ना  कर  बन्दे
पते  का  हाल  है  नंगा
पिटारे  में  असल  बातों
के  बदले  है  नया  दंगा ...!!
तेरी  ख्वाहिश  के  चिथड़ों  से
विषैली  हो  गयी  गंगा ....!!

लपेटा  है  अभी  कम्बल
यूँ  अपनी  जीभ  पर  मैंने
अभी  अख़लाक़  में  देखो
हुए  अल्फ़ाज़  भी  पैने
उधेड़े  हैं  सभी  काँटे
जो  फूलों  ने  भी  थे  पहने ...!!

मुझे  ग़ुमराह  ना  कर
नाम  के  नकली  ग़ुबारों  से
समझ  में  आ  गए  मुझको
टके  नकटे  सुनारों  के ....!!

ईलाही  के  इशारों  में
तू  करता  है  उलट  फेरी
ग़ुनाह  इतना  नहीं  तेरा
तेरी  नस्लों  ने  मैं  छेड़ी ...!!

मुझे  अब  बख्श  दे
ना  दूर  कर  मुझसे  मेरा  ईमां
बड़ी  मुद्द्त  लगी  बनने  में
मुझको  फिर  से  एक  इन्सां ...!!


******** विक्रम चौधरी ********   

" हथियारा ...."


















" हथियारा ...."

फ़लक  बाँधे  खड़ी  उम्मीद  के  बरसेंगी  अब  खुशियाँ
नज़र  साधे  खड़ी  तहज़ीब  के  बदलेगी  अब  दुनियाँ ...!!

मग़र  मायूस  हैं  उम्मीद  और  तहज़ीब  की  आँखें
रिवाज़ों  की  क़िलेबंदी  में  उलटी  चल  पड़ीं  साँसें ...!!

ईनामी  सूरतों  से  पुत  गयीं  शक़लें  दीवारों  की
अभी  चोरी  नहीं  पकड़ी  गयी  चोरों  के  बाड़ों  की ...!!

इरादा  नेक  है  मेरा  ख़ुदा  की  है  यही  मर्ज़ी
सिले  कपड़े  जहाँ  तेरे  वही  मेरा  भी  है  दर्ज़ी ...!!

बता  क्या  फ़र्क़  है  इसमें  जो  है  तुझमें  वही  मुझमें
तो  फिर  क्यों  रेत  के  पुतलों  में  तू  खोजे  नयी  क़िस्में ...!!

तू  खाता  है  कटी  बोटी  मैं  बोटी  काट  खाता  हूँ
मिटाता  है  तू  लिख  करके  लिखे  को  मैं  मिटाता  हूँ ...!!

छुपाता  है  तू  छुप  करके  छुपे  को  मैं  छुड़ाता  हूँ
लड़ाता  है  तू  बैठे  को  उठे  को  मैं  लड़ाता  हूँ ...!!

यहाँ  अच्छे  बुरे  कर्मों  का  लेखा  कौन  रखता  है
पहन  के  दूर  का  चश्मा  हर  एक  दूजे  को  तकता  है ...!!

ग़ुनाह  की  माफ़ियों  का  भी  भला  दफ्तर  ये  खोला  है
कभी  गंगा  कभी  क़ाबे  पे  धावा  रोज़  बोला  है ....!!

किया  जिसने  लक़ीरों  में  अताकारी  का  बँटवारा
उसी  के  हाथ  में  है  संत  और  डाकू  का  गलियारा ...!!

दुआ  के  दो  मुँहे  फंदे  में  जकड़ा  दर्द  बेचारा
तो  क्या  ग़लती  है  ये  मेरी  जो  बन  बैठा  मैं  हथियारा ....!!


************* विक्रम  चौधरी **************

Thursday, 13 March 2014

" क्या है ....."


















" क्या  है ....."

क्या  है  जीवन  क्या  है  माया
सरबस  कारण  क्या  है ...
क्या  है  चँदा  क्या  है  सूरज
जल  बिन  बादल  क्या  है ...!!

क्या  दीया  बाती  रैन  के  साथी
बेस्वप्न  नींद  भी  क्या  है
आधी  अधूरी  उम्मीद  नहाती
झूठा  फ़ितूर  भी  क्या  है .....!!

बने  बनाये  निजाम  के  साये 
दिल  मजबूर  ये  क्या  है
उड़े  पतंग  पर  पेच  ना  काटे 
चरखे  में  डोर  ये  क्या  है .....!!

क्या  चूल्हे  चाकी  दुखड़ों  की  माटी
पिसता  वजूद  भी  क्या  है
झूले  झुलाये  हिण्डोले  में  काठी
बरपा  सुकून  भी  क्या  है ........!!

अँधा  ना  माँगे  आँखों  के  तारे
शिक़वा  जुनून  ये  क्या  है
तोड़े  वैकुण्ठ  ना  धीर  के  धारे
मसला  संगीन  ये  क्या  है ......!!

******** विक्रम  चौधरी *********