" अल्फ़ाज़ हुए हल्के ...."
मौला ने दी ज़ुबां
ज़ुबां क्या काम आयी ....!
इन्सां के सगे इन्सां ने
तोहफ़े में बुरी सज़ा पायी ....!! "
कैसे बाँटूँ क्या परोसूँ
टोकूँ खुद को ही कोसूँ
अल्फ़ाज़ हुए हल्के .............!!
गए लहज़े से फिसल
गिरे होठों से निकल
बेवक़्त ही ये छलके
अल्फ़ाज़ हुए हल्के .............!!
पाल कर चली बुराई
मन से अहम् की लड़ाई
कच्चे कान हुए दिल के
अल्फ़ाज़ हुए हल्के .............!!
छोड़ो रंगों की रंगीनी
पानी में ख़ुशबू है भीनी
गंगा नहान करो मिलके
अल्फ़ाज़ हुए हल्के .............!!
खींचातानी है बलाकी
जानी मानी है चालाकी
बँधे हाथ खुले सबके
अल्फ़ाज़ हुए हल्के .............!!
टूटा चोरों का ये ताँता
मुख़बिर हुआ है सन्नाटा
सीखो मोल ये जीवन के
अल्फ़ाज़ हुए हल्के .............!!
गए लहज़े से फिसल
गिरे होठों से निकल
अल्फ़ाज़ हुए हल्के .............!!
*** विक्रम चौधरी ***

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