" नया दंगा ....."
पते की बात ना कर बन्दे
पते का हाल है नंगा
पिटारे में असल बातों
के बदले है नया दंगा ...!!
तेरी ख्वाहिश के चिथड़ों से
विषैली हो गयी गंगा ....!!
लपेटा है अभी कम्बल
यूँ अपनी जीभ पर मैंने
अभी अख़लाक़ में देखो
हुए अल्फ़ाज़ भी पैने
उधेड़े हैं सभी काँटे
जो फूलों ने भी थे पहने ...!!
मुझे ग़ुमराह ना कर
नाम के नकली ग़ुबारों से
समझ में आ गए मुझको
टके नकटे सुनारों के ....!!
ईलाही के इशारों में
तू करता है उलट फेरी
ग़ुनाह इतना नहीं तेरा
तेरी नस्लों ने मैं छेड़ी ...!!
मुझे अब बख्श दे
ना दूर कर मुझसे मेरा ईमां
बड़ी मुद्द्त लगी बनने में
मुझको फिर से एक इन्सां ...!!
******** विक्रम चौधरी ********
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