" हथियारा ...."
फ़लक बाँधे खड़ी उम्मीद के बरसेंगी अब खुशियाँ
नज़र साधे खड़ी तहज़ीब के बदलेगी अब दुनियाँ ...!!
मग़र मायूस हैं उम्मीद और तहज़ीब की आँखें
रिवाज़ों की क़िलेबंदी में उलटी चल पड़ीं साँसें ...!!
ईनामी सूरतों से पुत गयीं शक़लें दीवारों की
अभी चोरी नहीं पकड़ी गयी चोरों के बाड़ों की ...!!
इरादा नेक है मेरा ख़ुदा की है यही मर्ज़ी
सिले कपड़े जहाँ तेरे वही मेरा भी है दर्ज़ी ...!!
बता क्या फ़र्क़ है इसमें जो है तुझमें वही मुझमें
तो फिर क्यों रेत के पुतलों में तू खोजे नयी क़िस्में ...!!
तू खाता है कटी बोटी मैं बोटी काट खाता हूँ
मिटाता है तू लिख करके लिखे को मैं मिटाता हूँ ...!!
छुपाता है तू छुप करके छुपे को मैं छुड़ाता हूँ
लड़ाता है तू बैठे को उठे को मैं लड़ाता हूँ ...!!
यहाँ अच्छे बुरे कर्मों का लेखा कौन रखता है
पहन के दूर का चश्मा हर एक दूजे को तकता है ...!!
ग़ुनाह की माफ़ियों का भी भला दफ्तर ये खोला है
कभी गंगा कभी क़ाबे पे धावा रोज़ बोला है ....!!
किया जिसने लक़ीरों में अताकारी का बँटवारा
उसी के हाथ में है संत और डाकू का गलियारा ...!!
दुआ के दो मुँहे फंदे में जकड़ा दर्द बेचारा
तो क्या ग़लती है ये मेरी जो बन बैठा मैं हथियारा ....!!
************* विक्रम चौधरी **************

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