Saturday, 31 May 2014

" बुल्लेया ...."




















" बुल्लेया ...."

बुल्लेया  की  तस्वीर  बणावे
बण  जावे  ते  आप  मिटावे .....!
हथ्थ  खँजरी  ते  लब  ते  कलमा
पढ़  जावे  ते  ख़ाक  उड़ावे ......!!

जोगी  वाला  भेस  बणावे
रम  जावे  ते  राग  सुणावे ......!
छड  जिन्दड़ी  ते  छड  के  मजमा
छुप  जावे  ते  कोल  ना  आवे ....!!

ओक्खे  जी  दा  हाल  बतावे
रो  जावे  ते  नैंण  चुरावे .........!
कर  वालियां  दा  सोणा  सजदा 
सर  माथे  ते  राख  चढ़ावे ....!!

******* विक्रम  चौधरी *********

Sunday, 18 May 2014

" दर्द ना तुमको होता है ...."


















" दर्द  ना  तुमको  होता  है ...."

कैसी  दो  रंग  भरी  सीरत  आकाश  तले  रहती  है
चाँदी  की  चन्द  दुकानों  में  चुपके  से  वो  बिकती  है ....!!

जिस्मों  का  सौदा  खोल  के  चादर  होता  है
इन्सान  की  चुप्पी  पर  इन्सान  ये  रोता  है

फटता  है  कलेजा  मेरा
पर  दर्द  ना  तुमको  होता  है .....!!

पंछी  भी  अपने  जीव  की  ज़िम्मेदारी  जम  के  ढोता  है
पर  आदम  के  आईने  में  चेहरा  कुछ  और  ही  होता  है

जब  धूप  में  जलते  मासूमों  के  पाँओ  में  छाला  पड़ता  है
जब  आँसू  आँख  से  बह  कर  उसके  होंठ  पे  आकर  रुकता  है

फटता  है  कलेजा  मेरा
पर  दर्द  ना  तुमको  होता  है .....!!




मैली  सूरत  को  देख  के  गाड़ी  के  शीशों  का  उठ  जाना
दो  सिक्के  भीख  में  दे  करके  सीने  का  चौड़ा  हो  जाना
कीचड़  से  दूर  रहो  कह  कर  रूमाल  का  मुहँ  तक  आ  जाना
अबला  की  लुटती  लाज  पे  आँखें  फेर  के  आगे  बढ़  जाना

आता  है  तुम्हे  और  मुझको  भी 
अंग्रेज़ी  बोल  के  मुस्काना
भारत  को  पिछड़ा  कह  कर  के
आता  है  सभी  को  चिल्लाहना

जो  कुचला  सा  एक  फूल  सड़क  पर  सहमी  साँसें  भरता  है
हममें  से  किसी  माँ  की  मुर्दा  उस  कोख  का  ही  वो  हिस्सा  है
शायद  उसकी  छाती  से  दूध  नहीं  कुछ  और  ही  बहता  है

फटता  है  कलेजा  मेरा
पर  दर्द  ना  तुमको  होता  है .....!!


***** विक्रम  चौधरी ******

Saturday, 17 May 2014

" जमूरा ....."


















" जमूरा ....."

जमूरा  खेल  की  मस्ती  में  दीवाना
सिखाये  भीड़  के  सिक्कों  पे  मर  जाना ....!!

किसी  की  बाँध  कर  आँखें
किसी  की  थाम  कर  साँसें

किसी  के  होंठ  पर  हँस  के
किसी  की  बात  में  बस  के

वो  उछले  ढोल  की  थपकी  पे  मस्ताना ....!
जमूरा  खेल  की  मस्ती  में  दीवाना
सिखाये  भीड़  के  सिक्कों  पे  मर  जाना ....!!

धुँए  की  डोर  वो  पकड़े
कभी  डोरी  पे  जां  अटके
बजे  ताली  तो  उसका  दिल
ख़ुशी  में  ज़ोर  से  धड़के

ये  कैसा  खेल  है  मौला
खिलाड़ी  का  फ़ना  होना
लड़े  अपने  ही  फ़न  से
जिस्म  के  हिस्सों  का  हर  कोना ....!!

जमूरा  डुगडुगी  की  ताल  का  शाना
बिछाए  मौत  के  बिस्तर  पे  सिरहाना ....!!

जमूरा  खेल  की  मस्ती  में  दीवाना
सिखाये  भीड़  के  सिक्कों  पे  मर  जाना ....!!


*********** विक्रम  चौधरी ************

Wednesday, 14 May 2014

" सत्य जाने कौन है ....."
















" सत्य  जाने  कौन  है ....."

बूँद  बूँद  भर  के  अब  थक  गया  वियोम  है
ना  भरी  ये  ज़िन्दगी  घटता  घटता  रोम  है ...!!
युद्ध  की  ज़मीन  का  ना  कोई  विलोम  है
सत्य  के  समूल  में  सत्य  जाने  कौन  है .....!!

बशर  बशर  का  फ़ासला 
अपने  हाल  ही  बुना 
भरोसा  अपने  हाथ  का
अपने  हाथ  ही  धुना 

ना  बशर  के  बस  में  था
बख्शना  ग़ुनाह  को 
ना  था  बस  में  उसके 
बख्शना  ही  अपने  आप  को 

ना  उसे  सुधार  कर , निखारता  कोई  यहाँ 
ना  उसे  सँवार  कर  , निहारता  कोई  यहाँ  
ना  कोई  उसे  उसी  के  नाम  की  पुकार  दे
ना  उसे  वो  मौसिक़ी  की  रौशनी  उधार  दे 

सब  यहाँ  खड़े - खड़े  तमाशबीन  हो  गए
चीर  फाड़  करके  गोस्त  में  वो  लीन  हो  गए 

स्वाद  आ  रहा  बशर  की  उँगलियों  को  देख  लो 
जीत  का  जमूरा  कह  रहा  पतंगें  बीन   लो 

बात  बात  पर  बजा  है  शख़्श  देखो  ढोल  है
रात  भर  जला   जो  उसका  कतरा  कतरा  खोल  है 

बूँद  बूँद  भर  के  अब  थक  गया  वियोम  है
ना  भरी  ये  ज़िन्दगी  घटता  घटता  रोम  है ...!!
युद्ध  की  ज़मीन  का  ना  कोई  विलोम  है
सत्य  के  समूल  में  सत्य  जाने  कौन  है .....!!


************ विक्रम  चौधरी ************

" जाने कौन ख़ुदा है ..."















" जाने  कौन  ख़ुदा  है  ..."

भूख़  मरे  ना  मरे  दिलासा
कटे  हैं  खुर  क्यों  कटे  ना  फाँका ...
आधी  आधी  रात  चन्द्रमा
चील  को  ठौर  दिखाए
मानस  मन  से  घिरा  सोच  में
दूर  खड़ा  ललचाये ........!!

कौन  दुःशासन  है  जग  माहीं
जाने  कौन  भला  है
बंद  करो  सब  खुली  किवाड़ी
पग  पग  चोर  खड़ा  है
राम  कहीं , कहीं  नाम  है  अल्लाह
देखो  बशर  जुदा  है

इधर  ख़ुदा  है  उधर  ख़ुदा  है
कैसी  घोर  सुलह  है ............!!
मोह  माया  से  लड़े  आत्मा
जाने  कौन  ख़ुदा  है ............!!

एक  है  सूरत  ऐनक  सौ
हर  ऐनक  बने  मदारी
आँखें  तक  हैरां  ना  हों
मारे  जब  जीभ  गुलाटी

लगी  दीन  को  ठोकर  कस  के
देखो  असर  हुआ  है
चीर  कलेजा  मन  का  पंछी
जाने  कहाँ  उड़ा  है
पनहारी  का  देख  तमाशा
पनघट  गरज  उठा  है

मोह  माया  से  लड़े  आत्मा
जाने  कौन  ख़ुदा  है ............!!

***** विक्रम  चौधरी *****

" बाग़ी ....."
















" बाग़ी ....."

आकाश  गिरा  मौला
धरती  घर  छोड़  के  भागी
शैतान  के  जुमलों  पर
इन्सान  हुआ  है  बाग़ी ....!!

क़ातिल  है  मेरी  नीयत  की  छुरी
कोई  मुझको  क़ैद  करा  दे
मुझसे  है  बुरी  फ़ितरत  ये  मेरी
कोई  मुझसे  मुझे  छुड़ा  दे
काठी  है  मेरी  शैया  पे  रखी
कोई  मुझको  आग  दिखा  दे ....!!

मैं  खोद  के  दुःख  फिर  दर्द  कहूँ
मैं  बाँट  के  ख़ुद  को  फ़र्क़  करूँ
सीरत  के  उजले  दामन  पर
मैं  रात  से  ग़हरा  दाग़  रखूँ

मैं  आप  ख़ुदा  मैं  आप  बशर
मैं  आप  निजाद  मैं  आप  नज़र
क़ाफ़िर  है  मेरी  ये  भूख़  बढ़ी
कोई  मन  की  भूख़  मिटा  दे
काठी  है  मेरी  शैया  पे  रखी
कोई  मुझको  आग  दिखा  दे ....!!

मैं  रावण  दाँत  का  पेट  भरूँ
मैं  हार  की  मैय्यत  देख  डरूँ
पुरवा  की  शीतल  आहट  पर
मैं  ग़र्द  के  बादल  डाल  मरूँ

मैं  आप  दुआ  मैं  आप  क़हर
मैं  आप  इलाज  मैं  आप  ज़हर
डायन  है  मेरी  इच्छा  की  परी
कोई  इसके  पंख  कटा  दे
काठी  है  मेरी  शैया  पे  रखी
कोई  मुझको  आग  दिखा  दे ....!!

आकाश  गिरा  मौला
धरती  घर  छोड़  के  भागी
शैतान  के  जुमलों  पर
इन्सान  हुआ  है  बाग़ी ....!!

**** विक्रम  चौधरी ****

" रंगशाला ....."














" रंगशाला ....."

पृथ्वी  के  अधरों  पर
जीवन  की  है  रंगशाला ...
क़िरदार  में  मानव  के
कोई  चित्र  दिखा  है  काला ...!!

लाओ  तराज़ू  तौलें
आधे  पूरे  और  पौने
रह  जाएँ  ना  कुचले  मसले
ना  छोड़ो  कद  के  बौने ....

आधार  अलग  व्यापार  अलग
जीने  के  भी  संसार  अलग
बदलें  रग़  में  बहती  धारा
बच्चों  के  तंग  बिछौने
छोड़ें  दुखियों  को  रोने
लाओ  तराज़ू  तौलें ........!!

पृथ्वी  के  अधरों  पर
जीवन  की  है  रंगशाला ...
क़िरदार  में  मानव  के
कोई  चित्र  दिखा  है  काला ...!!

कुण्ठा  में  दफ़न  मासूम  ज़हन
काँटों  की  पकड़  में  है  धड़कन
रख  दो  सूली  पे  तन  सारा
दौड़ें  चल  जाल  बिछाने
बाँधें  नदिया  के  कोने
लाओ  तराज़ू  तौलें ........!!

पृथ्वी  के  अधरों  पर
जीवन  की  है  रंगशाला ...
क़िरदार  में  मानव  के
कोई  चित्र  दिखा  है  काला ...!!

***** विक्रम  चौधरी *****

" नदिया ...."















" नदिया ...."

नादिया  से  करूँ  मैं  सवाल
पूछे  नाहीं  मोसे  मोरा  हाल ... !!

बहे  क्यों  अकेली  छोड़  के  मोहे 
बने  ना  सहेली  जोड़  के  मोहे 
खींचे  नित  पुरवा  के  बाल .....!!

अंग  लगाए  नाव  के  अंग  से 
सुने  तू  मेघ  मल्हार
माझी  के  संग  संग  सुर  मिलाये
रीझे  तू  करके  श्रृंगार ...

करे  क्यों  ठिठोली  छेड़  के  मोहे
बनूँ  मैं  पहेली  झेल  के  तोहे ...
बीते  दिन  करके  मलाल ……!!

चींखे  री  मन  का  बैरी  मयूरा
आधी  आधी  रात
चाँद  की  गोद  में  बैठ  नहाये
तेरी  सब  सौगात ...

भरे  रे  हिलोरी  हेज  के  मोहे
करे  जोरा  जोरी  खेल  के  मोहे
छूए  नाहीं  रुख़े  मोरे  गाल ......!!


******** विक्रम  चौधरी *******

" अजी हाँ हाँ ...."

















" अजी  हाँ  हाँ ...."

हक़  भरे  आँसू  और  ख़ाब  के  टुकड़े
रोते  चिल्लाहते  मासूम  जान  के  मुखड़े ...!!

निकले  नश्तर  से  तीरों  का  है  ठिकाना  क्या
छलनी  सीने  का  होना  भी  है  दिखाना  क्या ...!!

हर  दिन  देखा  है  खुद  को
हाथों  की  लक़ीरों  में
कभी  मिटते  कभी  बनते
इरादों  के  ज़ख़ीरों  में ...!!

गिरते  देखा  है  खुद  को
आँखों  के  जज़ीरों  में ...!!

अपने  कानों  पर  पड़ती
आवाज़ें  अपनी  ही  तो  हैं
अपने  काँधों  पर  सजती
दुकानें  अपनी  ही  तो  हैं ...!!

ख़ुद  ही  बेचो  ख़ुद  ख़रीदो
तक़िये  से  नींदों  को  खींचो
चंगुल  में  फँसा  के  दाना
उड़ते  पंछी  को  दबोचो ...!!

इसी  काम  का  तज़ुर्बा  करो  अजी  हाँ  हाँ ....
बागड़  बिल्लों  की  ज़ुबानी  सीखो  जी  हाँ  हाँ  हाँ ....!!


************ विक्रम चौधरी *************

Tuesday, 13 May 2014

" मन्त्र ....."
















" मन्त्र ....." 

तिलिस्म  है  ना  जादू , ना  तंत्र  है 
क्या  है  ये  कारवाँ  ज़िन्दगी 
कैसा  मन्त्र  है  ....२ ..!!

बिना  पानी  के  है  गीला 
रंग  बिना  है  रंगीला .....!

झूठा  है  सच्चा  है  
थोड़ा  सा  कच्चा  है 
बढ़ती  उम्र  में  भी  
जाने  क्यों  बच्चा  है .....!!

क्या  है  ये  कारवाँ  ज़िन्दगी 
कैसा  मन्त्र  है  ....२ ..!!

चढ़ता  है  ख़ुद  अपनी  सीढ़ी  पे 
मैं  क्यों  पीछे  हूँ  मुझसे  कहता  है 
कसता  है  मुझको  यूँ  बेड़ी  में 
मैं  क्यों  बँधा  हूँ  मुझसे  कहता  है …..!!

कूचा - कूचा  चलता  हूँ  
गिरता  हूँ  सम्भलता  हूँ 
दौड़ता  है  वो  क्यों  पीछे  पीछे  मेरे 
हाथ  में  लिए  पत्थर  क्यों  रहता  है .....!!

खोद  कर  रखता  है  एक  नयी  क़ब्र  वो 
छेड़ता  है  मेरे  अनछुए  सब्र  को ..........!!

खींचता  है  मेरे  पाँव  से  वो  ज़मीं 
देखता  है  मेरी  आँख  में  जब  नमी ....!!

ना  रोने  देता  है  ना  हँसने  देता  है ....!

क्या  है  ये  कारवाँ  ज़िन्दगी 
कैसा  मन्त्र  है  ....२ ..........!!  

**** विक्रम  चौधरी ****

" रोती कलम ....."

















" रोती  कलम ....."

अल्फ़ाज़  के  हालात  पर
रोती  कलम  देखो ..........!
जिसको  नहीं  बाँटी  अक़ल
उसकी  शक़ल  देखो ........!!

उतरे  हैं  काग़ज़  पर 
हक़ीक़त  झूठ  फिर  एक  साथ  ही
किसको  कहें  ज़ालिम 
भला  किसको  कहें  हम  सादगी ...!

हाक़िम  की  हर  आवाज़  पर
ताली  ज़रा  फैंको .......!
जिसने  किये  छुप  कर  क़तल
खुल  कर  रहम  देखो ......!!

हमने  भी  अपने  दिल  को
समझाया  कहा  सोचो ....!
कुछ  तो  ज़माने  की 
क़रामातों  को  तुम  सीखो ...!!

अल्फ़ाज़  के  हालात  पर
रोती  कलम  देखो ..........!
जिसको  नहीं  बाँटी  अक़ल
उसकी  शक़ल  देखो ........!!


****** विक्रम  चौधरी ******

" क़िताब ....."

















" क़िताब ....."

क़िताब  जो  सही  से  ना  लिखी  गयी
लिखी  गयी  तो  ना  सही  पढ़ी  गयी ...!!

कैसी  तक़रार  है  तू  किससे  नाराज़  है
सीधे  अल्फ़ाज़  का  उल्टा  क्यों  जवाब  है …!!

बदल  गए  हैं  मायने  क्यों  तेरी  मुस्कान  के
ख़रीद  कर  रखे  जो  तूने  अपनी  ही  दुकान  से
थोड़ा  खिलखिलाने  में  तेरा  क्या  जाएगा
बनेगा  सबके  जैसा  फिर  मज़ा  तभी  तो  आएगा ...!!

कैसी  बक़वास  है  ये  किसकी  बारात  है
घोड़ी  पे  चढ़ा  है  फिर  भी  दूल्हा  ये  उदास  है ...!!

फिसल  गए  हैं  रास्ते  क्यों  तेरे  अरमान  के
उछल  के  आ  गए  थे  जो  कदम  पे  आसमान  से
थोड़ा  थामने  में  हाथ  तेरा  क्या  जाएगा
राह  में  खड़ा  कोई  मुक़ाम  पा  ही  जाएगा ....!!

थोड़ा  प्यार  बाँटने  में  तेरा  क्या  जाएगा
किसी  ग़रीब  का  फटा  लिहाफ़  सिल  जाएगा ....!!

कैसी  दीवार  है  जो  तुझ  पे  तार  तार  है
सरहदों  पे  काँपती  ये  ज़िन्दगी  उधार  है ....!!

शक्ल  आईने  में  तेरी  तुझको  नागँवार  है 
चेहरे  पे  चढ़ा  हुआ  नक़ाब  ज़ार  ज़ार  है .......!! 


************* विक्रम  चौधरी **************

" अल्लाह तेरी मेहरबानियाँ ...."
















" अल्लाह  तेरी  मेहरबानियाँ  ...."

अल्लाह  तेरी  मेहरबानियाँ  कुछ  कम  कर
के  अब  बशर  के  लब  से  खूं  निकलता  है ...!!

पड़ा  रहता  है  बंद 
वो  अपने  ही  दिल  के  किसी  कोने  में
जब  निकलता  है  दम 
तो  क्यों  कुछ  कम  निकलता  है ...!

अल्लाह  तेरी  मेहरबानियाँ  कुछ  कम  कर
के  अब  बशर  के  लब  से  खूं  निकलता  है ...!!

दबा  रहता  है  चुप 
वो  अपनी  ही  हथेली  के  नीचे  कहीं
के  जब  धड़कता  है  दिल
तो  क्यों  कुछ  ग़म  निकलता  है ...!

अल्लाह  तेरी  मेहरबानियाँ  कुछ  कम  कर
के  अब  बशर  के  लब  से  खूं  निकलता  है ...!!

छुपा  रहता  है  रुख़
क्यों  अपने  ही  आईने  के  पीछे  कहीं
के  जब  सँवरता  है  अक्स
तो  क्यों  आँखों  से  ख़म  निकलता  है ...!

एक  जैसे  ही  तो  दिखते  हैं  हम  परछाई  में
तो  क्यों  मेरे  रंग  पे  ज़माना  रंग  बदलता  है ...!!

अल्लाह  तेरी  मेहरबानियाँ  कुछ  कम  कर
के  अब  बशर  के  लब  से  खूं  निकलता  है ........!!


************ विक्रम  चौधरी **************

" दे हलकारा ....."



















" दे  हलकारा ....."

ये  वक़्त  है  बदला  लेने  का
और  ख़ुद  को  ज़रा  बदलने  का
बस  रहने  दे  अब  और  नहीं
तू  बोल  दे  बन्दे  हलकारा ... दे  हलकारा ....!!
माटी  ख़ुद  अपनी  बेच  के 
बे  माटी  है  देखो  जग  सारा ... दे  हलकारा .....!!

कब  तक  सड़कों  के  गड्ढों  में  ढूँढोगे  क़िस्मत  अपनी
कब  तक  मजबूर  के  पल्लू  से  पौंछोगे  सूरत  चिकनी ....!!

निकलो  F B  और  Twitter  से 
निकलो  अंग्रेज़ी  हूटर  से ....
तुम  रोज़  करप्शन  की  बातों  पर
घण्टों  ताव  दिखाते  हो ....
ये  है  ग़लत  और  वो  है  ग़लत
कह  कह  कर  आँख  चढ़ाते  हो ....!!

क्या  कभी  किसी  ने  आँख  मूँद  कर  ख़ुद  को  भी  देखा  है
सबकी  बॉलिंग  और  बैटिंग  में  हर  मौक़े  पर  चौका  है 
क्या  सिगनल  तोड़  के  हमने  ख़ुद  चालान  कभी  माँगा  है
जो  लेन  देन  से  जुड़ा  है  रहिमन  प्रेम  का  वो  धागा  है ......!!

चोर  पुलिस  की  रेस  में  गच्चा  कौन  यहाँ  खाता  है
है  दम  जिसके  जूते  में  दौड़  के  मंज़िल  वो  पाता  है
पहनो  सर  पे  टोपी  उजली  तो  सब  कुछ  मिल  जाता  है
वरना  सच्चाई  की  हाण्डी  में  झाँको  तो  सन्नाटा  है …….!!

बदलेगा  सिस्टम  सोच  के  हम  भी  चुप  करके  बैठे  हैं
क्या  हुआ  हूँ  मैं  पागल  बाजू  के  घर  भी  तो  बेटे  हैं .......!!



****************** विक्रम  चौधरी *******************

Sunday, 11 May 2014

" ये कैसा तंत्रजाल है ....."















" ये  कैसा  तंत्रजाल  है ....."

क्यों  ज़िन्दगी  पे  हर  तरफ़  निःशब्द  सा  सवाल  है …
खुले  से  आसमान  का  ये  कैसा  भूखा  हाल  है …
फ़ैसले  की  लौ  मैं  तपता  लम्हा  सुर्ख़  लाल  है …
तरकशों  की  माँद  मैं  आतंक  सा  ग़ुबार  है ...
मरघटी  से  लोथड़े  पे  आत्मा  सवार  है ...

ये  कैसा  तंत्रजाल  है .....!!

पहिया  काठ  का  चला  समय  को  काटता  चला 
अँधेरे  की  शमाओं  पे  बसेरा  काँपता  चला 
क्यों  पेच - ओ - ख़म  में  उलझा  
ये  उलझा  कर्महाल  है ....!

ये  कैसा  तंत्रजाल  है .....!!

मुखौटा  चेहरों  पे  चढ़ा  मज़ाक  बाँटता  फिरा 
बालाओं  के  जमाल  पे  सवेरा  साँप  सा  चला 
क्यों  बे फ़लक  सा  उड़ता  ये   
मन  मेरा  निढाल  है ….!

ये  कैसा  तंत्रजाल  है .....!!

** विक्रम  चौधरी **

Friday, 9 May 2014

" मज़हब के आईने में ....."















" मज़हब के आईने में ....."

कैसी ये ज़िन्दगी में गलघोंट सी मची है
मज़हब के आईने में सूरत नयी दिखी है ...!

हमने तो तीर भाले हाथों में हैं सम्भाले
दिल में गुबार छाया पैरों में भी हैं छाले ...!

तुम क्यों खड़े हो गुमसुम पत्थर ज़रा उछालो
काटो गली के चक्कर कपड़े भी खींच डालो ...!

देखो वो जा रहे हैं भद्दी सी शक़्ल वाले
रोको जी नाम पूछो खुलवाओ मुहँ के ताले ....!

भाई ...
वो कुछ बोला नहीं
तो हमने काट डाला ...
बाद में पता चला
वो गूँगा था ...
और शायद
अपना ही था ...
कोई बात नहीं , जंग है ...!
कुछ तो अपने भी
मरेंगे ...!!

जाने है कौन अपना है कौन अब पराया
शमशीर की ज़ुबां ने सबको कलम कराया .....!

आओ सियासी हमलों की जाँच तो करायें
इस बेनसल बला की दहशत से घर बचायें .....!!

कैसी ये तिश्नगी है सीने में जो चुभी है
इन्सान के हलक़ में इन्सां की जां फँसी है ....!!

कैसी ये ज़िन्दगी में गालघोंट सी मची है
मज़हब के आईने में सूरत नयी दिखी है .......!!!!

********* विक्रम चौधरी *********

Thursday, 8 May 2014

" बारी बारी ....."
















" बारी  बारी ....."

बारी  बारी  काट  हर  हमने  सुखन  के  तन  को  देखा
था  लहू  उसकी  रग़ों  में  सबके  जैसा  भीगा - भीगा ....!!

क्यों  भला  उसने  ही  समझा  फूल  का  क़िस्सा  नया
कैसे  बनती  है  कली  करती  है  भँवरों  से  निक़ाह ....!!
क्यों  परिन्दों  के  परों  को  बैठ  वो  गिनता  रहा
क्यों  गुटरगूँ  की  लहर  पे  शब्द  वो  सिलता  रहा ....!!

क्यों  उसी  के  सामने  बादल  ने  चेहरों  को  जना
क्यों  बिलखती  जान  को  उसने  दुआओं  में  चुना ...!!

क्या  कभी  तुमने  हवा  के  गाल  को  छू  करके  देखा
क्या  कभी  तुमने  गगन  से  कश्तियों  को  आते  देखा ...!!

क्यों  भला  होकर  दफ़न  मिट्टी  में  इन्सां  सो  गया
डिब्बियों  में  भर  के  रिश्ता  ज़िन्दगी  से  खो  गया ....!! 

बारी  बारी  ख़ोज  कर  हमने  सुखन  के  मन  को  देखा
था  जुनूं  उसके  जिगर  में  साँस  लेता  सुलगा  सुलगा ...!!

बारी  बारी  काट  हर  हमने  सुखन  के  तन  को  देखा
था  लहू  उसकी  रग़ों  में  सबके  जैसा  भीगा - भीगा ......!!



****************** विक्रम  चौधरी ****************** 

Wednesday, 7 May 2014

" क्यों ....."



















" क्यों ....."

क्यों  मुहाल - ए - मस्ती  का 
तुम  मज़ाक  बनाते  हो
क्यों  तारीख़ - ए - क़त्ल  की 
तस्वीर  में  तुम  नहाते  हो ...!!

काम  से  तुम  खाली  रहते  हो
कदम  दर  कदम  मवाली  रहते  हो
क्यों  हुक्मरानों  की  मोजड़ी  में
कील  के  बटके  बन  जाते  हो ....!

क्यों  तारीख़ - ए - क़त्ल  की 
तस्वीर  में  तुम  नहाते  हो ...!!

खूँटे  से  तुम  बँधे  रहते  हो
अपने  ही  गोबर  में  सने  रहते  हो
क्यों  ज़र्द हालों  की  झौंपड़ी  में
बरसात  के  टपके  बन  जाते  हो ....!

क्यों  तारीख़ - ए - क़त्ल  की 
तस्वीर  में  तुम  नहाते  हो ...!!



******* विक्रम  चौधरी *******

Monday, 5 May 2014

" मन क़ाफ़िर ....."



















" मन  क़ाफ़िर ....."

मन  क़ाफ़िर  पिंजरा  तोड़  उड़ा
क़ाबा  मंदिर  सब  छोड़  उड़ा ....!!

जाने  किस  पथ  आकाश  मिले
किस  पथ  आदम  आज़ाद  मिले

चिड़ियों  में  चिड़ी  मैं  बन  बैठा
रस्ता  ना  जिधर  उस  ओर  मुड़ा ....!

मन  क़ाफ़िर  पिंजरा  तोड़  उड़ा .......!!

पाये  साथी  भूले  बिसरे
उजले  चेहरे  थे  गये  गुज़रे

नदिया  में  लहर  मैं  बन  बैठा
क़श्ती  ने  कहा  चल  ज़ोर  दिखा .....!

मन  क़ाफ़िर  पिंजरा  तोड़  उड़ा .......!!

देखा  फिर  उधड़े  हाल  शहर
फ़ुटपाथ  रखे  महलों  पे  नज़र

बाज़ार  कहे  जा  बेच  भी  आ
मिट्टी  की  डली  को  बोल  ख़ुदा .......!

मन  क़ाफ़िर  पिंजरा  तोड़  उड़ा .......!
क़ाबा  मंदिर  सब  छोड़  उड़ा ...........!!


******** विक्रम  चौधरी *********