" अल्लाह
तेरी मेहरबानियाँ ...."
अल्लाह
तेरी मेहरबानियाँ कुछ कम कर
के
अब बशर के लब से खूं निकलता
है ...!!
पड़ा
रहता है बंद
वो
अपने ही दिल के किसी कोने में
जब
निकलता है दम
तो
क्यों कुछ कम निकलता है ...!
अल्लाह
तेरी मेहरबानियाँ कुछ कम कर
के
अब बशर के लब से खूं निकलता
है ...!!
दबा
रहता है चुप
वो
अपनी ही हथेली के नीचे कहीं
के
जब धड़कता है दिल
तो
क्यों कुछ ग़म निकलता है ...!
अल्लाह
तेरी मेहरबानियाँ कुछ कम कर
के
अब बशर के लब से खूं निकलता
है ...!!
छुपा
रहता है रुख़
क्यों
अपने ही आईने के पीछे कहीं
के
जब सँवरता है अक्स
तो
क्यों आँखों से ख़म निकलता
है ...!
एक
जैसे ही तो दिखते हैं हम परछाई में
तो
क्यों मेरे रंग पे ज़माना रंग बदलता है
...!!
अल्लाह
तेरी मेहरबानियाँ कुछ कम कर
के
अब बशर के लब से खूं निकलता
है ........!!
************ विक्रम चौधरी **************

No comments:
Post a Comment