" बारी
बारी ....."
बारी
बारी काट हर हमने सुखन के तन को देखा
था
लहू उसकी रग़ों में सबके जैसा भीगा - भीगा ....!!
क्यों
भला उसने ही समझा फूल का क़िस्सा
नया
कैसे
बनती है कली करती है भँवरों से निक़ाह ....!!
क्यों
परिन्दों के परों को बैठ वो गिनता रहा
क्यों
गुटरगूँ की लहर पे शब्द वो सिलता रहा
....!!
क्यों
उसी के सामने बादल ने चेहरों को जना
क्यों
बिलखती जान को उसने दुआओं में चुना ...!!
क्या
कभी तुमने हवा के गाल को छू करके देखा
क्या
कभी तुमने गगन से कश्तियों
को आते देखा ...!!
क्यों
भला होकर दफ़न मिट्टी में इन्सां सो गया
डिब्बियों में भर के रिश्ता ज़िन्दगी
से खो गया ....!!
बारी
बारी ख़ोज कर हमने सुखन के मन को देखा
था
जुनूं उसके जिगर में साँस लेता सुलगा सुलगा
...!!
बारी बारी काट हर हमने सुखन के तन को देखा
था लहू उसकी रग़ों में सबके जैसा भीगा - भीगा ......!!
****************** विक्रम चौधरी ******************

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