" बाग़ी ....."
आकाश गिरा मौला
धरती घर छोड़ के भागी
शैतान के जुमलों पर
इन्सान हुआ है बाग़ी ....!!
क़ातिल है मेरी नीयत की छुरी
कोई मुझको क़ैद करा दे
मुझसे है बुरी फ़ितरत ये मेरी
कोई मुझसे मुझे छुड़ा दे
काठी है मेरी शैया पे रखी
कोई मुझको आग दिखा दे ....!!
मैं खोद के दुःख फिर दर्द कहूँ
मैं बाँट के ख़ुद को फ़र्क़ करूँ
सीरत के उजले दामन पर
मैं रात से ग़हरा दाग़ रखूँ
मैं आप ख़ुदा मैं आप बशर
मैं आप निजाद मैं आप नज़र
क़ाफ़िर है मेरी ये भूख़ बढ़ी
कोई मन की भूख़ मिटा दे
काठी है मेरी शैया पे रखी
कोई मुझको आग दिखा दे ....!!
मैं रावण दाँत का पेट भरूँ
मैं हार की मैय्यत देख डरूँ
पुरवा की शीतल आहट पर
मैं ग़र्द के बादल डाल मरूँ
मैं आप दुआ मैं आप क़हर
मैं आप इलाज मैं आप ज़हर
डायन है मेरी इच्छा की परी
कोई इसके पंख कटा दे
काठी है मेरी शैया पे रखी
कोई मुझको आग दिखा दे ....!!
आकाश गिरा मौला
धरती घर छोड़ के भागी
शैतान के जुमलों पर
इन्सान हुआ है बाग़ी ....!!
**** विक्रम चौधरी ****

No comments:
Post a Comment