Wednesday, 7 May 2014

" क्यों ....."



















" क्यों ....."

क्यों  मुहाल - ए - मस्ती  का 
तुम  मज़ाक  बनाते  हो
क्यों  तारीख़ - ए - क़त्ल  की 
तस्वीर  में  तुम  नहाते  हो ...!!

काम  से  तुम  खाली  रहते  हो
कदम  दर  कदम  मवाली  रहते  हो
क्यों  हुक्मरानों  की  मोजड़ी  में
कील  के  बटके  बन  जाते  हो ....!

क्यों  तारीख़ - ए - क़त्ल  की 
तस्वीर  में  तुम  नहाते  हो ...!!

खूँटे  से  तुम  बँधे  रहते  हो
अपने  ही  गोबर  में  सने  रहते  हो
क्यों  ज़र्द हालों  की  झौंपड़ी  में
बरसात  के  टपके  बन  जाते  हो ....!

क्यों  तारीख़ - ए - क़त्ल  की 
तस्वीर  में  तुम  नहाते  हो ...!!



******* विक्रम  चौधरी *******

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