" अजी हाँ हाँ ...."
हक़ भरे आँसू और ख़ाब के टुकड़े
रोते चिल्लाहते मासूम जान के मुखड़े ...!!
निकले नश्तर से तीरों का है ठिकाना क्या
छलनी सीने का होना भी है दिखाना क्या ...!!
हर दिन देखा है खुद को
हाथों की लक़ीरों में
कभी मिटते कभी बनते
इरादों के ज़ख़ीरों में ...!!
गिरते देखा है खुद को
आँखों के जज़ीरों में ...!!
अपने कानों पर पड़ती
आवाज़ें अपनी ही तो हैं
अपने काँधों पर सजती
दुकानें अपनी ही तो हैं ...!!
ख़ुद ही बेचो ख़ुद ख़रीदो
तक़िये से नींदों को खींचो
चंगुल में फँसा के दाना
उड़ते पंछी को दबोचो ...!!
इसी काम का तज़ुर्बा करो अजी हाँ हाँ ....
बागड़ बिल्लों की ज़ुबानी सीखो जी हाँ हाँ हाँ ....!!
************ विक्रम चौधरी *************

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