Sunday, 18 May 2014

" दर्द ना तुमको होता है ...."


















" दर्द  ना  तुमको  होता  है ...."

कैसी  दो  रंग  भरी  सीरत  आकाश  तले  रहती  है
चाँदी  की  चन्द  दुकानों  में  चुपके  से  वो  बिकती  है ....!!

जिस्मों  का  सौदा  खोल  के  चादर  होता  है
इन्सान  की  चुप्पी  पर  इन्सान  ये  रोता  है

फटता  है  कलेजा  मेरा
पर  दर्द  ना  तुमको  होता  है .....!!

पंछी  भी  अपने  जीव  की  ज़िम्मेदारी  जम  के  ढोता  है
पर  आदम  के  आईने  में  चेहरा  कुछ  और  ही  होता  है

जब  धूप  में  जलते  मासूमों  के  पाँओ  में  छाला  पड़ता  है
जब  आँसू  आँख  से  बह  कर  उसके  होंठ  पे  आकर  रुकता  है

फटता  है  कलेजा  मेरा
पर  दर्द  ना  तुमको  होता  है .....!!




मैली  सूरत  को  देख  के  गाड़ी  के  शीशों  का  उठ  जाना
दो  सिक्के  भीख  में  दे  करके  सीने  का  चौड़ा  हो  जाना
कीचड़  से  दूर  रहो  कह  कर  रूमाल  का  मुहँ  तक  आ  जाना
अबला  की  लुटती  लाज  पे  आँखें  फेर  के  आगे  बढ़  जाना

आता  है  तुम्हे  और  मुझको  भी 
अंग्रेज़ी  बोल  के  मुस्काना
भारत  को  पिछड़ा  कह  कर  के
आता  है  सभी  को  चिल्लाहना

जो  कुचला  सा  एक  फूल  सड़क  पर  सहमी  साँसें  भरता  है
हममें  से  किसी  माँ  की  मुर्दा  उस  कोख  का  ही  वो  हिस्सा  है
शायद  उसकी  छाती  से  दूध  नहीं  कुछ  और  ही  बहता  है

फटता  है  कलेजा  मेरा
पर  दर्द  ना  तुमको  होता  है .....!!


***** विक्रम  चौधरी ******

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