Friday, 9 May 2014

" मज़हब के आईने में ....."















" मज़हब के आईने में ....."

कैसी ये ज़िन्दगी में गलघोंट सी मची है
मज़हब के आईने में सूरत नयी दिखी है ...!

हमने तो तीर भाले हाथों में हैं सम्भाले
दिल में गुबार छाया पैरों में भी हैं छाले ...!

तुम क्यों खड़े हो गुमसुम पत्थर ज़रा उछालो
काटो गली के चक्कर कपड़े भी खींच डालो ...!

देखो वो जा रहे हैं भद्दी सी शक़्ल वाले
रोको जी नाम पूछो खुलवाओ मुहँ के ताले ....!

भाई ...
वो कुछ बोला नहीं
तो हमने काट डाला ...
बाद में पता चला
वो गूँगा था ...
और शायद
अपना ही था ...
कोई बात नहीं , जंग है ...!
कुछ तो अपने भी
मरेंगे ...!!

जाने है कौन अपना है कौन अब पराया
शमशीर की ज़ुबां ने सबको कलम कराया .....!

आओ सियासी हमलों की जाँच तो करायें
इस बेनसल बला की दहशत से घर बचायें .....!!

कैसी ये तिश्नगी है सीने में जो चुभी है
इन्सान के हलक़ में इन्सां की जां फँसी है ....!!

कैसी ये ज़िन्दगी में गालघोंट सी मची है
मज़हब के आईने में सूरत नयी दिखी है .......!!!!

********* विक्रम चौधरी *********

No comments:

Post a Comment