
" मन क़ाफ़िर ....."
मन
क़ाफ़िर पिंजरा तोड़ उड़ा
क़ाबा
मंदिर सब छोड़ उड़ा
....!!
जाने
किस पथ आकाश मिले
किस
पथ आदम आज़ाद मिले
चिड़ियों
में चिड़ी मैं बन बैठा
रस्ता
ना जिधर उस ओर मुड़ा ....!
मन
क़ाफ़िर पिंजरा तोड़ उड़ा
.......!!
पाये
साथी भूले बिसरे
उजले
चेहरे थे गये गुज़रे
नदिया
में लहर मैं बन बैठा
क़श्ती
ने कहा चल ज़ोर दिखा .....!
मन
क़ाफ़िर पिंजरा तोड़ उड़ा
.......!!
देखा
फिर उधड़े हाल शहर
फ़ुटपाथ
रखे महलों पे नज़र
बाज़ार
कहे जा बेच भी आ
मिट्टी
की डली को बोल ख़ुदा .......!
मन
क़ाफ़िर पिंजरा तोड़ उड़ा
.......!
क़ाबा
मंदिर सब छोड़ उड़ा
...........!!
******** विक्रम
चौधरी *********
No comments:
Post a Comment