" मन्त्र ....."
तिलिस्म है ना जादू , ना तंत्र है
क्या है ये कारवाँ ज़िन्दगी
कैसा मन्त्र है ....२ ..!!
बिना पानी के है गीला
रंग बिना है रंगीला .....!
झूठा है सच्चा है
थोड़ा सा कच्चा है
बढ़ती उम्र में भी
जाने क्यों बच्चा है .....!!
क्या है ये कारवाँ ज़िन्दगी
कैसा मन्त्र है ....२ ..!!
चढ़ता है ख़ुद अपनी सीढ़ी पे
मैं क्यों पीछे हूँ मुझसे कहता है
कसता है मुझको यूँ बेड़ी में
मैं क्यों बँधा हूँ मुझसे कहता है …..!!
कूचा - कूचा चलता हूँ
गिरता हूँ सम्भलता हूँ
दौड़ता है वो क्यों पीछे पीछे मेरे
हाथ में लिए पत्थर क्यों रहता है .....!!
खोद कर रखता है एक नयी क़ब्र वो
छेड़ता है मेरे अनछुए सब्र को ..........!!
खींचता है मेरे पाँव से वो ज़मीं
देखता है मेरी आँख में जब नमी ....!!
ना रोने देता है ना हँसने देता है ....!
क्या है ये कारवाँ ज़िन्दगी
कैसा मन्त्र है ....२ ..........!!
**** विक्रम चौधरी ****

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