" ये कैसा तंत्रजाल है ....."
क्यों ज़िन्दगी पे हर तरफ़ निःशब्द सा सवाल है …
खुले से आसमान का ये कैसा भूखा हाल है …
फ़ैसले की लौ मैं तपता लम्हा सुर्ख़ लाल है …
तरकशों की माँद मैं आतंक सा ग़ुबार है ...
मरघटी से लोथड़े पे आत्मा सवार है ...
ये कैसा तंत्रजाल है .....!!
पहिया काठ का चला समय को काटता चला
अँधेरे की शमाओं पे बसेरा काँपता चला
क्यों पेच - ओ - ख़म में उलझा
ये उलझा कर्महाल है ....!
ये कैसा तंत्रजाल है .....!!
मुखौटा चेहरों पे चढ़ा मज़ाक बाँटता फिरा
बालाओं के जमाल पे सवेरा साँप सा चला
क्यों बे फ़लक सा उड़ता ये
मन मेरा निढाल है ….!
ये कैसा तंत्रजाल है .....!!
** विक्रम चौधरी **

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