Wednesday, 2 October 2013

" मैं कौन हूँ ...."

















" मैं   कौन   हूँ  ...."


ना   पूछ   मेरे   यार
के   मैं   कौन   हूँ   कहाँ   से   हूँ  ...
ज़ात  क्या   है   मेरी 
कौनसी   बिरादरी   से   हूँ  ...!!

पूजता   हूँ   राम   को   या   अल्लाह   मेहरबान   को
गुरु   के   ग्रन्थ   को   या   ईसा   पे   लिखी   क़िताब  को  ...!!

शूद्र   हो   के   मल   गया   मैं   अपनी   पहचान   को
ब्राह्मण   हो   के   छल   गया   मैं   सच्चे   इंसान   को
क्षत्रिय   हो   के   भी   बचा   सका   ना   अपनी   लाज   को
वैश्य   हो   के   खा   गया   मैं   धरती   के   अनाज   को  ...!!

ना   पूछ   मेरे   यार
के   मैं   कौन   हूँ   कहाँ   से   हूँ  ...

मुखौटा   माया   में   रंगा   रंगीन   और   हो   गया
जो   मामला   आसान   था   संगीन   और   हो   गया
आज़ाद   पंछियों   पे   देखो   पिंजरा   आज   कस   गया
देखो   आसतीन   में   यूँ   नाग   सबके   बस   गया  ....!!

ना   पूछ   मेरे   यार
के   मैं   कौन   हूँ   कहाँ   से   हूँ  ...

पाक़   हो   गया   मैं   करके   गंगा   स्नान   को
सभ्य   हो   गया   मैं   पाके   काग़ज़ों   के   ज्ञान   को
हो   गया   मैं   संत   बाँच   के   कथा   पुराण   को
मुक्त   हो   गया   मैं   करके   श्रेष्ठ   गृहस्थ   दान   को  ...!!

ना   रहा   मनुष्य   अब   ना   हूँ   मैं   जीव   ही   कोई
निकली   आत्मा   शरीर   से   मेरी   मरी   हुई  .................!!

ना   पूछ   मेरे   यार
के   मैं   कौन   हूँ   कहाँ   से   हूँ  ...
ज़ात  क्या   है   मेरी 
कौनसी   बिरादरी   से   हूँ  ...!!

******* विक्रम  चौधरी ********

Thursday, 23 May 2013

" नारी ....."

















" नारी ....."

दुविधा  कैसी  है  भारी
पड़  गयी  अचरज  में  नारी
लज्जा  के  झूठे  नाम  पे  लुटती
हर  युग  में  बेचारी ...

सतयुग  में  राजा  रंक  हुआ
था  वो  दरिया  दिल  दानी
बिक  गयी  एक  सेठ  की चौखट पे
दुखियारी  तारा  रानी ...

त्रेता  में  वन  का  वास  हुआ
कैकई  ने  की  मनमानी
मर्यादा  की  ख़ातिर  सीता  ने
जलने  की  थी  ठानी ...

द्वापर  में  छल  का  राज  हुआ
पासों  में  उछली  वाणी
द्रोपदि  के  चीर  हरण  पे  था
सबकी  आँखों  में  पानी ...

कलयुग  में  काल  है  अतरंगा
नारी  का  जिस्म  है  अधनंगा
कभी  घूँघट  में  कभी  बुर्खों  में
कभी  पश्चिम  भेस  के  टुकड़ों  में
सम्मान  को  ढकती  नारी ....

कसती  पौरुष  के  पिंजरे  में
अबला  असमत  की  मारी ...
लज्जा  के  झूठे  नाम  पे  लुटती
हर  युग  में  बेचारी ................!!


" विक्रम चौधरी "


Wednesday, 22 May 2013

" कृष्णा उदास ....."


















" कृष्णा उदास ....."

साँचा तन साँस छोड़े झूठ के बखेड़ों में
धुआं धुआं बढ़े दुआ भीड़ के थपेड़ों में
आधी लगे भरी पूरी बात
बिन राधा लगे कृष्णा उदास .....

जैसे सुख चले दुःख लेके साथ
बिन पानी नहीं बुझे जी की प्यास
जैसे साधू कहे जनता को दास
बिन बाती दीया सूनी काटे रात ....!!

छोटे छोटे हाथों की नन्ही सी हथेली है
करे हुड़दंग माया कैसी ये पहेली है
रोये मन पढ़ी जाए बात
बिन साथी लगे सपनों में आग .....!

मुरझाती आँखों में नखरे नवेले हैं
अस्सी पार उमरों के दुखड़े अकेले हैं
मिली बिन गुदड़ी की खाट
बिन पूँजी नहीं जीवन के ठाठ .....!

बलखाते रस्तों पे धूप की सवारी है
सूखे सूखे पनघट सूरतिया कारी है
ढूँढे सर छैया का पात
बिन माझी नहीं नदिया में राग .....!

आधी लगे भरी पूरी बात
बिन राधा लगे कृष्णा उदास .........!!


" विक्रम चौधरी "

" गड़बड़ घोटाला ...."




" गड़बड़ घोटाला ...."

टेंशन में ईमान है भैया
फ़ैशन में बेईमानी ...
ट्रैफ़िक में है गोल रुपैया
मुश्क़िल में ज़िन्दगानी ...
तनख्वाह को पेट्रोल खा गया
टैक्स ने ठगी जवानी ....!!

गड़बड़ घोटाला ...२ ... २ ...
अनपढ़ की गुल्लक में पड़ गया
पढ़े लिखों का ताला ...
गड़बड़ घोटाला ...२ ... २ ...

अब सींग नहीं हैं शैतां के
ना सूरत का वो काला
नाम है सुन्दर नेता के
2g  और कैग हवाला
अब तो उजली खाल में मिलता
गुंडा भोला भाला ...
गड़बड़ घोटाला ...२ ... २ ...

पेंशन कोरी ख़ाक है भैया
भूखी [है] बूढ़ी नानी
हर लड़की पे रेप का पहिया
चढ़ के करे सलामी
रिश्वत का बाज़ार छा गया
ओढ़ के चूनर धानी ...

गड़बड़ घोटाला ...२ ... २ ...
अनपढ़ की गुल्लक में पड़ गया
पढ़े लिखों का ताला ...
गड़बड़ घोटाला ...२ ... २ ...

    
" विक्रम चौधरी "

Tuesday, 21 May 2013

" क्या मज़ाक है ...."


















" क्या  मज़ाक  है ...."

दिन  से  पूछे  रात
पूछे  शाम  से  प्रभात
किसकी  बिगड़ी  है  जी  बात
क्या  मज़ाक  है .....

आदमी  की  ज़ात
क्यों  है  जिन्न  की  बिसात
किसकी  उधड़ी  है  जी  खाट
क्या  फ़साद  है .....

तीन  रंगी  वर्दियों  की  गुफ़्तगू  का  जायज़ा
झोंपड़ी  में  पकती  दाल  को  ज़रा  जला  गया ...
आ  गया  निकल  के  बाक़ी  चुस्कियों  में  ज़ायका
बिस्कुटों  के  ख़त्म  होने  तक  भूचाल  आ  गया ...

मैल  धोते  हाथ
बाँटें  धर्म  का  प्रसाद
किसकी  निकली  है  बरात
क्या  रिवाज़  है .....

इसकी  टोपी  उसके  सर  पे  कर  रही  मुशायरा
शेर  जो  पिटा  तो  जूता  हाथ  में  ये  आ  गया ...
बढ़  गया  पिघल  के  नरकी  बस्तियों का  दायरा
जिस्म  की  पनाह  को  जिस्म  का  बाज़ार  खा  गया ...

ढूंढे  रूह  का  ताज
नौ निहाल  की  आवाज़
किसकी  छत  पे  बैठा  बाज़
क्या  शिकार  है .....
क्या  मज़ाक  है .....!!


" विक्रम  चौधरी "

Thursday, 16 May 2013

" जा री बरखा ...."


















" जा  री  बरखा ...."

प्यास  के  मारे  कूओं  के  घर  जा
नीम  सी  खारी  नदियों  के  घर  जा
जा  सूखे  सूखे  ढाक  दरख्तों  पर
जा  रेत  में  जलते  जरजर  ऊँठों  पर
जा  बूँद  को  तकते  रूखे  होठों  पर

जा  री  बरखा  जा  जा  री  बरखा
छोड़  के  बादल  धरती  के  घर  जा ...

कैसी  है  खींचातानी  क्या  वक़्त  की  कारिस्तानी
शरबत  के  घाट  भरे  हैं  पर  ख़त्म  हुआ  है  पानी
मौला  तू  जान  के  बदले  ले  बैठा  है  ज़िन्दगानी ...

जा  नींद  में  सोते  इन्दर  के  घर  जा
जा  खेत  की  बंजर  माटी  के  घर  जा
जा  री  बरखा  जा  जा  री  बरखा
छोड़  के  बादल  धरती  के  घर  जा ...

आते  हैं  जीभ  को  झौंके  खाती  है  वो  गुड़दानी
चौके  चूल्हों  से  की  है  बारिश  ने  नाफ़रमानी
कोई  गीली  पलकों  से  भी  लेकर  पीता  है  पानी ....

जा  झील  में  मरती  मछली  के  घर  जा
जा  धूप  में  उबले  पंछी  के  घर  जा ....
जा  री  बरखा  जा  जा  री  बरखा
छोड़  के  बादल  धरती  के  घर  जा .......!!


" विक्रम  चौधरी "

Wednesday, 15 May 2013

" नन्ही सी एक परी ...."















" नन्ही  सी  एक  परी ...."

पुरानी  सारी  चीज़ें
पुराने  वॉल  पेपर
उतार  फैंके  मैंने ....
सजा  दी  अलमारी  में  बार्बी  डौल  प्यारी
ताली  बजाता  बन्दर  की  वॉल  भी  गुलाबी ...
आने  वाली  है
नन्ही  सी  एक  परी
खिलने  वाली  है
बंद  सी  एक  कली ....

उड़ा  उड़ा  सा  तन  उड़ा  उड़ा  सा  मन
अपनी  ही  बातों  में  बीत  जाए  दिन ...
महकने  वाली  है
होठों  की  पंखुड़ी
आने  वाली  है
नन्ही  सी  एक  परी .....!

गुज़रते  गए  पल  बढ़ी  है  उलझन
नहीं  है  सच  ये  ख़ाबों  की  धड़कन
बैठी  हैं  आँखें  खोले  शिकारियों  की  साँसें ...
मिले  जो  जिस्म  कच्चा  वहीँ  वो  दाँत  मारें ...

है  इंतज़ार  उनको  भी  नन्ही  परियों  का
सूनी  सी  गलियों  में  नन्हे  से  क़दमों  का
अकेली  सड़कों  पे  नशीली  कुव्वतों  का
फूलों  सी  मंद  मंद  मुस्कुराहटों  का .....

लगता  है  मुझे  डर
ना  हो  ऐसी  महर ...
भरे  ना  गोद  मेरी
दुआ  हो  बे  असर ....

पुरानी  सारी  चीज़ें
पुराने  वॉल  पेपर
लगाए  फिर  से  मैंने ...
सजाया  अलमारी  में  ब्लैक  फ्रेम  खाली
आँखें  छुपाता  बन्दर  थोड़ी  गुस्से  की  गाली ...

आने  वाली  है
नन्ही  सी  एक  परी ...
आँखें  है  मेरी
अभी  डरी  डरी ..........!!


" विक्रम  चौधरी "

Friday, 10 May 2013

" बारी आयी माँ बनने की....."



















बेटी  बन  के  हुई  अभागन
भाग  में  झूठी  गोद  मिली
खेल  खिलौने  टूटे  फूटे
दुनियाँ  चार  दीवार  मिली ....

बन  के  बहन  हुई  मैं  कारण
भाई  की  चिंता  रोज  बढ़ी
आन  बने  मेरे  तन  के  टुकड़े
बाप  के  जी  का  जाल  बनी ....

पत्नी  बन  के  हुई  मैं  दासी
सास  ननद  की  फाँस  बनी
हाथ  में  आये  चौके  चूल्हे
सेज  पति  की  रात  बनी ....

बारी  आयी  माँ  बनने  की
लड़की  से  औरत  बनने  की
सौभाग्यवती  बहु  बनने  की

कोख  को  भी  आदेश  हुआ  है
लाल  जानेगी  यही  दुआ  है
जो  बेटी  तूने  जन्मी  तो
जीवन  भर  जलने  की  सज़ा  है ....

मैया  बन  के  हुई  मैं  प्यासी
ममता  लहू  लुहान  हुई
बेटी  जन  के  कोख  अभागन
जग  में  लुटती  लाज  हुई ..........!!


" विक्रम  चौधरी "

Wednesday, 1 May 2013

" मेरी आत्मा ..."
















" मेरी  आत्मा ..."

अधखुले  पंख  लिए
हाथों  में  झूठे  शंख  लिए
बद्हवास  सी  यथार्थ  के  पन्नों  से  परे
विचारों  की  मृगतृष्णा  के  अधीन
सत्य  की  मनतृष्णा  से  क्षीण
आधार  विहीन  इच्छा  से  दीन
जिव्हा  के  स्वाद  को  चखे
चटकारे  लिए  जा  रही  है  मेरी  आत्मा .....

एक  बरबाद  सौदागर  जैसा
मटमैला  सा  सलवट  पड़ा  जिस्म ...
मानो  जैसे  सफ़र  पर  हो
मंज़िल  पूछो  तो  उसे  पता  ना  हो ...
आकाश  और  धरती  के  बीच  फँसा  हो
देखो  तो  ठहरा  भी  ना  हो ...

चरागों  की  खोजपरस्ती  के  अधीन
इबादत  की  काश्तकारी  से  क्षीण
कर्तव्य-विहीन  आदत  से  दीन
माया  के  ताज  को  लिए
तख़्त  पर  चढ़े  जा  रही  है  मेरी  आत्मा ....

इस  छोर  से  उस  छोर
उस  छोर  से  इस  छोर
ना  पतंग  ना  गुब्बारे
ना  पानी  के  फ़व्वारे
छिछले  से  ख़्याल  की
टोपी  सर  रख  कर
बाँध  कर  सूरत  से  सौहबत  की  डोर
काले  घोड़े  पर  हो  कर  सवार
सफ़ेद  घोड़े  की  तलाश  में
बस  दौड़े  जा  रही  है  मेरी  आत्मा .....

मील  के  पत्थर  से  दूरी  के  मानक  मिटाते  हुए
हार  की  दस्तक  पर  दरवाज़ों  को  छुपाते  हुए
सोच  के  परिंदे  को  आकाश  में  उड़ाते  हुए
ख़ाब  की  सरगर्मी  का  हक़ीक़त  से  वास्ता  कराते  हुए
मौत  की  चहलकदमी  को  दूसरों  का  घर  दिखाते  हुए

जीवन  की  भरसकना  के  अधीन
अगम्य  की  जयवर्षा  से  क्षीण
सूक्ष्म-विहीन  मनुष्यता  से  दीन
दृष्टि  में  स्वप्न  लिए
होठों  पे  लफ़्ज़  लिए
बेख़ौफ़ , बेरास्ता  हुए
बस  उड़े  जा  रही  है  मेरी  आत्मा .....!!

******* विक्रम  चौधरी **********

" मेरा बन्दा..."
















" मेरा  बन्दा..."

रेंगता  ही  रहा  केंचुए  की  तरह

कच्ची  मिट्टी  की  भीगी  परतों  में  कहीं ...

हौले  हौले  चले  कछुए  की  तरह

करके  छुट्टी  वो  जीते  शर्तों  में  कहीं ...!!


मेरा  बन्दा  ये  पुतला  इबादत  का  है

मसला  ग़म  का  नहीं  बस  इफ़ाज़त  का  है ...!!


होगा  हंगामा  मुर्गा  हलाल  नहीं

सबके  होठों  पे  होगा  सवाल  यही

मन  की  बिरयानी  मासूम  होगी  नहीं

पकते  चावल  पे  होगा  बवाल  यहीं ....


मेरा  बन्दा  बाशिंदा  मौहब्बत  का  है

दरिया  मुर्दा  सही  दिल  तबस्सुम  सा  है ...!!


होगा  मृत्यु  का  मुम्क़िन  इलाज  नहीं

सबके  कर्मों  की  लिखी  जायेगी  बही

कच्चे  कलवे  सब  बेकार  हो  जायेंगे

होगा  चुल्लू  भर  पानी  का  राज  यहीं  ....


बोली  सबकी  सुनी  जायेगी  अब  यहाँ

कलकि  होगा  वही  जो  बिकेगा  नहीं ....!!


मेरा   बन्दा   शर्मिंदा   आहिस्ता   सा   है

जलसा  छलिया  नहीं  छल  की  चिंता  का  है ...

हक़  इजाज़त  का  है  रब  ख़िलाफ़त  का  है ...

कुचले  सपनों  का  क़िस्सा  बग़ावत  का  है .......!!

********* विक्रम  चौधरी **********