" सारे लम्हे ....."
बेज़ुबान थे वो सारे लम्हे
सख़्तजान थे वो सारे लम्हे
तान चादर सर छुपा कर सो रहे थे
सर क़लम इन्सान के जब हो रहे थे ...!!
झील सी आँखों में क़तरा ख़ून का था
अक़्स मातम का वो लेकर घूमता था
ज़र्द हाल थे वो सारे लम्हे
उधड़ी खाल थे वो सारे लम्हे
हादसों पर मारे डर कर सो रहे थे
सौ जनम शैतान के जब हो रहे थे .......!!
चाँदनी रातों का चंदा गुमशुदा था
बादलों में मौन हो कर वो छुपा था
बेईमान थे वो सारे लम्हे
दिल पे दाग़ थे वो सारे लम्हे
गर्द पी कर ख़ुद को सीं कर सो रहे थे
दर्द जब ज़ालिम क़सीदे बो रहे थे .........!!
******* विक्रम चौधरी ********


