" मेरा बन्दा..."
रेंगता ही रहा केंचुए की तरह
कच्ची मिट्टी की भीगी परतों में कहीं ...
हौले हौले चले कछुए की तरह
करके छुट्टी वो जीते शर्तों में कहीं ...!!
मेरा बन्दा ये पुतला इबादत का है
मसला ग़म का नहीं बस इफ़ाज़त का है ...!!
होगा हंगामा मुर्गा हलाल नहीं
सबके होठों पे होगा सवाल यही
मन की बिरयानी मासूम होगी नहीं
पकते चावल पे होगा बवाल यहीं ....
मेरा बन्दा बाशिंदा मौहब्बत का है
दरिया मुर्दा सही दिल तबस्सुम सा है ...!!
होगा मृत्यु का मुम्क़िन इलाज नहीं
सबके कर्मों की लिखी जायेगी बही
कच्चे कलवे सब बेकार हो जायेंगे
होगा चुल्लू भर पानी का राज यहीं ....
बोली सबकी सुनी जायेगी अब यहाँ
कलकि होगा वही जो बिकेगा नहीं ....!!
मेरा बन्दा शर्मिंदा आहिस्ता सा है
जलसा छलिया नहीं छल की चिंता का है ...
हक़ इजाज़त का है रब ख़िलाफ़त का है ...
कुचले सपनों का क़िस्सा बग़ावत का है .......!!
********* विक्रम चौधरी **********

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