" जा री बरखा ...."
प्यास के मारे कूओं के घर जा
नीम सी खारी नदियों के घर जा
जा सूखे सूखे ढाक दरख्तों पर
जा रेत में जलते जरजर ऊँठों पर
जा बूँद को तकते रूखे होठों पर
जा री बरखा जा जा री बरखा
छोड़ के बादल धरती के घर जा ...
कैसी है खींचातानी क्या वक़्त की कारिस्तानी
शरबत के घाट भरे हैं पर ख़त्म हुआ है पानी
मौला तू जान के बदले ले बैठा है ज़िन्दगानी ...
जा नींद में सोते इन्दर के घर जा
जा खेत की बंजर माटी के घर जा
जा री बरखा जा जा री बरखा
छोड़ के बादल धरती के घर जा ...
आते हैं जीभ को झौंके खाती है वो गुड़दानी
चौके चूल्हों से की है बारिश ने नाफ़रमानी
कोई गीली पलकों से भी लेकर पीता है पानी ....
जा झील में मरती मछली के घर जा
जा धूप में उबले पंछी के घर जा ....
जा री बरखा जा जा री बरखा
छोड़ के बादल धरती के घर जा .......!!
" विक्रम चौधरी "

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