" मेरी आत्मा ..."
अधखुले पंख लिए
हाथों में झूठे शंख लिए
बद्हवास सी यथार्थ के पन्नों से परे
विचारों की मृगतृष्णा के अधीन
सत्य की मनतृष्णा से क्षीण
आधार विहीन इच्छा से दीन
जिव्हा के स्वाद को चखे
चटकारे लिए जा रही है मेरी आत्मा .....
एक बरबाद सौदागर जैसा
मटमैला सा सलवट पड़ा जिस्म ...
मानो जैसे सफ़र पर हो
मंज़िल पूछो तो उसे पता ना हो ...
आकाश और धरती के बीच फँसा हो
देखो तो ठहरा भी ना हो ...
चरागों की खोजपरस्ती के अधीन
इबादत की काश्तकारी से क्षीण
कर्तव्य-विहीन आदत से दीन
माया के ताज को लिए
तख़्त पर चढ़े जा रही है मेरी आत्मा ....
इस छोर से उस छोर
उस छोर से इस छोर
ना पतंग ना गुब्बारे
ना पानी के फ़व्वारे
छिछले से ख़्याल की
टोपी सर रख कर
बाँध कर सूरत से सौहबत की डोर
काले घोड़े पर हो कर सवार
सफ़ेद घोड़े की तलाश में
बस दौड़े जा रही है मेरी आत्मा .....
मील के पत्थर से दूरी के मानक मिटाते हुए
हार की दस्तक पर दरवाज़ों को छुपाते हुए
सोच के परिंदे को आकाश में उड़ाते हुए
ख़ाब की सरगर्मी का हक़ीक़त से वास्ता कराते हुए
मौत की चहलकदमी को दूसरों का घर दिखाते हुए
जीवन की भरसकना के अधीन
अगम्य की जयवर्षा से क्षीण
सूक्ष्म-विहीन मनुष्यता से दीन
दृष्टि में स्वप्न लिए
होठों पे लफ़्ज़ लिए
बेख़ौफ़ , बेरास्ता हुए
बस उड़े जा रही है मेरी आत्मा .....!!
******* विक्रम चौधरी **********

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