Tuesday, 21 May 2013

" क्या मज़ाक है ...."


















" क्या  मज़ाक  है ...."

दिन  से  पूछे  रात
पूछे  शाम  से  प्रभात
किसकी  बिगड़ी  है  जी  बात
क्या  मज़ाक  है .....

आदमी  की  ज़ात
क्यों  है  जिन्न  की  बिसात
किसकी  उधड़ी  है  जी  खाट
क्या  फ़साद  है .....

तीन  रंगी  वर्दियों  की  गुफ़्तगू  का  जायज़ा
झोंपड़ी  में  पकती  दाल  को  ज़रा  जला  गया ...
आ  गया  निकल  के  बाक़ी  चुस्कियों  में  ज़ायका
बिस्कुटों  के  ख़त्म  होने  तक  भूचाल  आ  गया ...

मैल  धोते  हाथ
बाँटें  धर्म  का  प्रसाद
किसकी  निकली  है  बरात
क्या  रिवाज़  है .....

इसकी  टोपी  उसके  सर  पे  कर  रही  मुशायरा
शेर  जो  पिटा  तो  जूता  हाथ  में  ये  आ  गया ...
बढ़  गया  पिघल  के  नरकी  बस्तियों का  दायरा
जिस्म  की  पनाह  को  जिस्म  का  बाज़ार  खा  गया ...

ढूंढे  रूह  का  ताज
नौ निहाल  की  आवाज़
किसकी  छत  पे  बैठा  बाज़
क्या  शिकार  है .....
क्या  मज़ाक  है .....!!


" विक्रम  चौधरी "

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