" सत्य
जाने कौन है ....."
बूँद
बूँद भर के अब थक गया वियोम है
ना
भरी ये ज़िन्दगी
घटता घटता रोम है
...!!
युद्ध
की ज़मीन का ना कोई विलोम है
सत्य
के समूल में सत्य जाने कौन है .....!!
बशर
बशर का फ़ासला
अपने
हाल ही बुना
भरोसा
अपने हाथ का
अपने
हाथ ही धुना
ना
बशर के बस में था
बख्शना
ग़ुनाह को
ना
था बस में उसके
बख्शना
ही अपने आप को
ना
उसे सुधार कर , निखारता कोई यहाँ
ना
उसे सँवार कर ,
निहारता कोई यहाँ
ना
कोई उसे उसी के नाम की पुकार दे
ना
उसे वो मौसिक़ी
की रौशनी उधार दे
सब
यहाँ खड़े - खड़े तमाशबीन
हो गए
चीर
फाड़ करके गोस्त में वो लीन हो गए
स्वाद
आ रहा बशर की उँगलियों
को देख लो
जीत का जमूरा कह रहा पतंगें
बीन लो
बात
बात पर बजा है शख़्श देखो ढोल है
रात
भर जला जो उसका कतरा कतरा खोल है
बूँद
बूँद भर के अब थक गया वियोम है
ना
भरी ये ज़िन्दगी
घटता घटता रोम है
...!!
युद्ध
की ज़मीन का ना कोई विलोम है
सत्य
के समूल में सत्य जाने कौन है .....!!
************ विक्रम चौधरी ************

No comments:
Post a Comment