" सरकार की हिंसा ....."
बीहड़ में कूदे हिम्मत हारे बेबस इन्सां ...
रोटी पे चुभा फ़रमान दिखे सरकार की हिंसा ...
क़ानून तवायफ़ के कोठे सा भाव करे ...
बेईमान समाजी दुकां पे नरसंहार करे ...
बेख़ौफ़ क़लन्दर बना है बन्दर बढ़ी है चिंता ...
सूली पे टिका अरमान दिखे सरकार की हिंसा ... !!
नक्सलबारी की बाड़ बहे
सम्मान बिलखती जान दिखे ...
कहीं बँटे धर्म कहीं ज़ात बिक़े
कहीं शिक्षा भी असमान बँटे ...
कहीं हाथ भरे पर बोझ नहीं
कहीं बोझ से दब कर हाथ मरे ...
नफ़रत से रूख़े असमत हारे बेदुम इन्सां ...
चोटी पे चढ़ा एहसान दिखे सरकार की हिंसा ......!!
सागर की लहर ने खोयी हँसी
धरती जल का व्यापार करे ....
पर्वत की सहर में है बेबसी
जंगल चिड़ियों पे वार करे ....
बारिश की छुअन पे रोयी ज़मीं
बदरा बंजरपन दान करे .....
अँधे बन घूमे रहमत हारे बेकस इन्सां ...
मिट्टी पे लुटा वरदान दिखे सरकार की हिंसा .....!!
है कौन क़यामतकारी है किसकी नीयत भारी .....
जन्मेगा कब ये कलकि है किसकी ज़िम्मेदारी ....
सीरत के झूठे शिद्दत हारे बेसुध इन्सां ...
गिद्धों का बुना जंजाल दिखे सरकार की हिंसा ......!!
**************** विक्रम चौधरी *****************

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