" मतवारे मनवा ......"
मन बाँच बाँच हारे चिठिया ...
दिखलावे सपना
मन बेशुमार बाँटे चिठिया .....!!
मन मर्ज़ी के अश्क़ बहावे
मन की हँसी हँसावे ...
मन श्रृंगार करे मन अन्दर
मन की पटी पढ़ावे ...
मन से हारे मन सुलगावे
मन की बात बिसारे ...
मन से जीते मन मुस्कावे
मन की मौज उबारे ...
मन मण्डी के भाव उठावे
मन की पुड़ी बनावे ...
मन संवाद करे मन अन्दर
मन की छुरी चलावे ...
मतवारे मनवा
मन बाँच बाँच हारे चिठिया ...
दिखलावे सपना
मन बेशुमार बाँटे चिठिया .....!!
मन के द्वारे मन भरमावे
मन की लाज उजाड़े ...
मन से भीगे मन ललचावे
मन की खाल उतारे ...
मन मिथ्या के भोग लगावे
मन की नदी बहावे ...
मन अँगार चखे मन अन्दर
मन की मति फिरावे ...
मतवारे मनवा
मन बाँच बाँच हारे चिठिया ...
दिखलावे सपना
मन बेशुमार बाँटे चिठिया .....!!
******* विक्रम चौधरी *******

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