Wednesday, 24 September 2014

" बशर नये ...."















" बशर  नये ...."

क़ातिलों  को  मिल  गए  बशर  नये
मिल  गए  दरिन्दों  को  शहर  नये ...!

किसका  इंतज़ार  कर  रहे  हो  तुम  बताओ  तो 
सामने  हैं  खिलखिलाहटें  उन्हें  सताओ  तो 

काट  लो  या  खौंस  लो
हँसी  को  लब  से  नौंच  लो
गोस्त  जो  पड़ा  ज़मीन  पर  
उसे  भी  पौंछ  लो 

बिगड़े  हाल  का  मज़ाक  तुमने  भी  उड़ा  लिया
सोते  पंछी  का  घरौंदा  हमने  भी  चुरा  लिया ...
झूठ  के  लिबास  को  तुमने  आज़मा  लिया
सत्य  के  लिहाफ़  का  हमने  ख़ातमा  किया ….
 
जीतने  में  देर  हम  भी  क्यों  करें
मर  गए  हैं  थोड़ा  थोड़ा  और  मरें ...
  
क़ातिलों  को  मिल  गए  बशर  नये
मिल  गए  दरिन्दों  को  शहर  नये ....!!


"" विक्रम  चौधरी ""

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