" काल का बटका ...."
काल का बटका भर के बोली
पीतल की दो सूंत की गोली
लाल करें कुछ सर्द हवाएँ
आओ चलो मिल खेलें होली ...!!
जिद मरी जीत की परी
इत मरी कुछ उत मरी
साथ लिए कुछ माँस के टुकड़े
उछल के मेरे द्वार पड़ी .......!!
गुंचा गुंचा बाग़ उजाड़े
बरगद के दो वृक्ष उखाड़े
मानवता के बोल वचन ने
मानव के अरमान बिगाड़े ......!!
देख सजन अन्धों की टोली
काणे ने पहनी तंग चोली
खेल रहा गंभीर कलाएं
भरे निरंतर खाली झोली ......!!
***** विक्रम चौधरी *****

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