" क्या पता .... "
आँख
लग जाने से पहले
हम
हँसें तुम भी हँसो
...!
शाम
ढल जाने से पहले
हम
चलें तुम भी चलो
...!!
क्या
पता उस ख़ाब के हाथों से हो जाएँ क़तल
क्या
पता रातों में रास्ता पाँओ से जाए फिसल
जेब
के कोने सिलो
देखो
जहाँ भी छेद हो
बेवजह
खोलो ना मुट्ठी
चाहे
जितनी रेत हो
चील
के तकने से पहले
हम
उठें तुम भी उठो
...!
साँस
फट जाने से पहले
हम
लड़ें तुम भी लड़ो
...!!
क्या
पता उस घाव के टुकड़े से बन जाए ग़ज़ल
क्या
पता फिर ज़िन्दगी
आ जाए घर मौज़ू बदल
ज़ेर
को ज़िन्दा रखो
मुश्क़िल
भले ही जीत हो
तैश
के काँधों से उतरो
इल्म
जब ख़ुर्शीद हो
आँख
लग जाने से पहले
हम
हँसें तुम भी हँसो
...!
शाम
ढल जाने से पहले
हम
चलें तुम भी चलो
...!!
"" विक्रम चौधरी ""
मौज़ू - विषय
ज़ेर= हारा हुआ
ख़ुर्शीद - सूर्य

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