" फ़िरंग दरिंदे सा ...."
क्या साँस पे धूप सा जलता है
क्या अन्दर मुझमें गलता है
क्या वक़्त फ़िरंग दरिंदे सा
सीने में मौत सा पलता है ...!!
दिल मुझसे कहे उड़ जाऊँ मैं
सौ बादल पार हो जाऊँ मैं ...
नादान है वो कम सुनता है
बेजान से धागे बुनता है
क्या वक़्त फ़िरंग दरिंदे सा
सीने में मौत सा पलता है ...!!
दो गाल पे थपकी बहला दो
धड़कन को थाम के सहला दो
रख दो धूआँ सिरहाने पर
नींदों में ख़ाब को सुलगा दो
आँखों से अश्क़ जो निकलें तो
अश्क़ों को राख़ से नहला दो ....!!
पागलपन शोर उगलता है
ख़ाबों में चाँद उबलता है
क्या वक़्त फ़िरंग दरिंदे सा
सीने में मौत सा पलता है ...!!
क्या वक़्त के ढीठ निवाले में
गाढ़ा सा ख़ून का क़तरा है
ख़्वाहिश के काँपते चेहरे से
चेहरा कोई टूट के उतरा है
ख़ामोश है वो चुप रहता है
बिन बोले सब कुछ कहता है
क्या वक़्त फ़िरंग दरिंदे सा
सीने में मौत सा पलता है ....!!
क्या साँस पे धूप सा जलता है
क्या अन्दर मुझमें गलता है
क्या वक़्त फ़िरंग दरिंदे सा
सीने में मौत सा पलता है ....!!
"" विक्रम चौधरी ""

No comments:
Post a Comment