Sunday, 19 February 2012

" ढोर है लीला ..."
















ढोर  है  लीला ..."

मन  मोर  हठीला 
भीगे  रोज़  होवे  गीला ...
मदिरा  की  नगरी  में 
सब  ढोर  है  लीला ...!

ज़िन्दगी  खुला  तमाशा 
बिक  जाए  अच्छा  ख़ासा 
ढूँढे  अपनी  ख़बर 
पाके  मोड़  ज़रा  सा ...!

खाली  पड़ी  है  सुराही 
देखे  जग  की  हँसाई 
भरे  झूठा  ये  सबर 
बात  समझ  ना  आयी ...!

नाज़  करे  बेशरम 
भरे  चौखटे  का  दम   
माँगे  सबकी  नज़र
थोपे  मौला  पे  करम ...!

दुनियाँ  को  देके  झाँसा  
दिया  ख़ुद  को  दिलासा 
नखरों  की  मोजड़ी  में
ठोके  ज़ोर  ख़ुदा  का ...!

तोड़ा  राग  सुरीला 
आसमां  को  तूने  छीला 
आँधियों  की  चकरी  में 
डोले  चोर  रंगीला ....!

मन  मोर  हठीला
भीगे  रोज़  होवे  गीला ...
मदिरा  की  नगरी  में 
सब  ढोर  है  लीला ....!!

**** विक्रम  चौधरी ****

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