" तीरथ तेरह तीन ......"
मैं साँच पढूँ और झूठ गढ़ूं ...
है राम नाम का दाम खरा ...
ना धीर धरूँ मैं दान करूँ ...
है भेड़ चाल का गाम हरा ....!
मैं तीरथ तेरह तीन करूँ ...
है झोल झाल पे मौन धरा ...!!
बाँझिन की पीर पे जिन्न अड़ा
हो कैसे अब संतान भला
नारी पे नर की जीत का देखो
खेल ये अपरम्पार खड़ा .......!!
पैदा हो कर माटी से तू
माटी से ही परहेज़ करे
काग़ज़ के फूल पे इत्र छिड़क
आँगन को तू गुलरेज़ करे
क्या जुलम कहूँ इसे वहम कहूँ
है मस्त इलाही दूर खड़ा .......!
मैं तीरथ तेरह तीन करूँ ...
है झोल झाल पे मौन धरा ...!!
खोजे खो कर अपनी ख़ुशबू
अपनी ही क़बर तू खोद मरे
दिखना है तुझे क्यों सबसे अलग
अल्लाह की तू क्यों होड़ करे
मैं ज़हन सिलूँ और ठहर जीयूँ
है वक़्त की लत में दर्द भरा .....!
मैं तीरथ तेरह तीन करूँ ...
है झोल झाल पे मौन धरा ...!!
******* विक्रम चौधरी *********

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