" तलवार पुरानी ......"
हाथ में लो तलवार पुरानी ...!
ख़तरे में अपना ही वतन है
ग़ैरों का अय्यार जतन है ...
डॉलर को देते हो सलामी
छोड़ो उधड़ी ख़ाल ग़ुलामी ...!!
नक्कालों के जाल ने निकलो
सौदों की हड़ताल से निकलो
बेइमानों पर ठोक दो ताला
रिश्वत पे अब तान दो भाला
सरकारी गोदाम से निकलो
दल्लों की भरमार से निकलो ...
रपट लिखाओ उस थाने में
जिधर ना ख़ाकी फिरे दिवानी ...
अब होने दो तैयार जवानी
हाथ में लो तलवार पुरानी ...!
दबा हुआ है स्वर्ण ख़ज़ाना
भूचालों अब रंग दिखाना
जबरनदाज़ी दौर खुला
अब खेतों में है बूचड़खाना ...
बेगारी की मार से निकलो
बेकारी की हार से निकलो
बिफ़र पड़ी खूंखार बिमारी
अहं की दस्तक सब पर भारी ...
अब छोड़ो तंतर ताल मसानी
पकड़ के मारो चोर ईनामी ....
अब होने दो तैयार जवानी
हाथ में लो तलवार पुरानी ...!!
******* विक्रम चौधरी *********

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