" पताका ......"
चित्त फाड़ के मनवा जागा ...
खिल उठी अटारी बन्दों की
कट मरा रे जहरी धागा ...
अन्तर्यामी जब चींख पड़ा
जग सुन्दर वन सा लागा ...!!
भोर की जिद्द में तारों ने
उम्मीद कहाँ थी छोड़ी ...
उस रात के साथी चंदा ने
पतवार भँवर संग जोड़ी ...
खुल गयी पिटारी नागों की
छल छोड़ सपेरा भागा .....!!
ख़ामोश खड़े मस्तानों ने
दीवार कहाँ थी तोड़ी ...
शब्दों में सिले इन्सानों ने
थी शर्म की चादर ओढ़ी ...
थम गयी अदालत अंधों की
घर छोड़ के शकुनी भागा ....!!
अन्तर्यामी जब चींख पड़ा
जग सुन्दर वन सा लागा ...!!
******* विक्रम चौधरी *********

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