" बोल बाला ......"
शातिरों का बोल बाला
बोतलों का शोर साला
चलता है नज़र छुपा के
मंदिरों में चोर काला
नाक में नकेल सी है
साँस घुटती बेबसी है
वक़्त ये उछल पड़ा है
लग रहा है मूहँ पे ताला ...!!
चार दिन की चाँदनी को सोचता है ज़िन्दगी ..
जेब है फटी मग़र क्यों गिनतियाँ हैं नोट की …
अज़ान की पुकार सुन के
धड़कने क्यों तेज़ हैं
क्यों नकचढ़े ईमान पे
बदलते सबके भेस हैं …
धड़ कटी उमंग शाला
ढूंढें बूँद बूँद हाला …
बढ़ती हक़ की धूल खोके
बेड़ियों पे झूले ताला …
काट के पतंग मेरी ख़ुश हुआ ख़ुदा कहीं ..
बरसा बन के बादलों सा गरजा फूँक भर नहीं ..
पड़ोस का मकान बन के
मुझपे क्यों कलेश है
क्यों सनसनी के गाल पे
तमाचा अपना देस है …. !!
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विक्रम चौधरी *********

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