" अपना ही सच ......"
मनसूबे सर पर चढ़े भूखे ख़ाबों के
झाँके ना क्यों शख्स अपनी गिरेबाँ में
सूली चढ़े अक्स झटके से आँखों में
रोका ना जाए
क्यों टोका ना जाए ...
जोड़ा ना जाए
क्यों तोड़ा ना जाए ...
क्यों अपना ही सच
ख़ुद पे ओढ़ा ना जाए ...!
आधे पड़े काम पूरे से काँधों पे
परदे पड़े मैले बरसों से वादों पे
ख़र्चे गए लफ़्ज़ मन के बाज़ारों में
औंधे पड़े वक़्त के बंद कानों में
ढूँढा ना जाए
क्यों पूछा ना जाए ...
साँझा ना जाए
क्यों सूँघा ना जाए ...
क्यों अपना ही मूहँ
कौर अपना ना खाए ...
क्यों अपना असर
ख़ुद में पाया ना जाए ....!!
क्यों अपना ही सच
ख़ुद पे ओढ़ा ना जाए ....!!
***** विक्रम चौधरी *******

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