" बंदिशें ......"
बंदिशें फिर तमाम थीं ..
मुझमें हस्ती नाक़ाम थीं ..
पर्दा रोने पे किया
बस यही शौक़ था मेरा …
अपने चेहरे के यकीं पर
शक्ल जां थी …
आज ना होना है पूरा
ना अभी आधे में जीना
जो मिला इश्क़ - ए - मुक़द्दर
वो नज़र थी …
अश्क़ ने बहना है छोड़ा
है अभी ग़म का महीना
जो दुआ दूर थी पल भर
वो असर थी …
ग़ैर नादान था थोड़ा
उसने कुछ भी नहीं छीना
जो दवा थी मेरे घर पर
वो ज़हर थी …
बंदिशें फिर तमाम थीं ..
मुझमें हस्ती नाक़ाम थीं ....!!
**** विक्रम चौधरी ****

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