“ खेल है ये ज़िन्दगानी ....”
रात की बैरन ख़ाक छान ले …
ख़ाब की बेरंग राख़ बाँट ले …
दो चार दिनों का खेल है ये …
खेल है ये जिंदगानी ……!!
माशूक़ नहीं पर इश्क़ है ये …
इश्क़ है ये जिंदगानी ….....!!
मायूस पड़ी हैं पंखुड़ियाँ
बस फूल है ये जिंदगानी …!!
दो चार दिनों का खेल है ये
खेल है ये जिंदगानी ….......…!!
पत्थर की मूरत जग भर
तू पत्थर सा बन जा रे …
ना खून बहे ना चींख उठे
तू खंडर सा तन जा रे …
मन पेड़ की पाती रोज़ चुघे …
तू डाल से अब उड़ जा रे ……….!
ख़ामोश खड़ी हैं जल परियाँ
बस नीर है ये ज़िन्दगानी …........!
दो चार दिनों का खेल है ये
खेल है ये जिंदगानी ….......…!!
मंज़ूर नहीं तुझको यम घर
अड़ी मौत से तू भिड़ जा रे …
ना रूह कटे ना भीख मिटे
फिरे वक़्त से तू लड़ जा रे …
रो रो मालिक ख़ुद आप थके …
तू हार को अब हर जा रे ……….!
तारीख़ चढ़ी हैं सब घड़ियाँ
बस दौड़ है ये ज़िन्दगानी …........!
दो चार दिनों का खेल है ये …
खेल है ये जिंदगानी ….......…!!
******* विक्रम चौधरी ********
रात की बैरन ख़ाक छान ले …
ख़ाब की बेरंग राख़ बाँट ले …
दो चार दिनों का खेल है ये …
खेल है ये जिंदगानी ……!!
माशूक़ नहीं पर इश्क़ है ये …
इश्क़ है ये जिंदगानी ….....!!
मायूस पड़ी हैं पंखुड़ियाँ
बस फूल है ये जिंदगानी …!!
दो चार दिनों का खेल है ये
खेल है ये जिंदगानी ….......…!!
पत्थर की मूरत जग भर
तू पत्थर सा बन जा रे …
ना खून बहे ना चींख उठे
तू खंडर सा तन जा रे …
मन पेड़ की पाती रोज़ चुघे …
तू डाल से अब उड़ जा रे ……….!
ख़ामोश खड़ी हैं जल परियाँ
बस नीर है ये ज़िन्दगानी …........!
दो चार दिनों का खेल है ये
खेल है ये जिंदगानी ….......…!!
मंज़ूर नहीं तुझको यम घर
अड़ी मौत से तू भिड़ जा रे …
ना रूह कटे ना भीख मिटे
फिरे वक़्त से तू लड़ जा रे …
रो रो मालिक ख़ुद आप थके …
तू हार को अब हर जा रे ……….!
तारीख़ चढ़ी हैं सब घड़ियाँ
बस दौड़ है ये ज़िन्दगानी …........!
दो चार दिनों का खेल है ये …
खेल है ये जिंदगानी ….......…!!
******* विक्रम चौधरी ********

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