" मूरख मन ...."
पाखण्ड भरा पानी का घड़ा
भूले को अमृत जान पड़ा
क्या झूठ गढ़ा क्या साँच पढ़ा
नीयति ना करे खुलासा
भूमि , अग्नि , अम्बर , वायु
जल पञ्चभूत परिभाषा
निश्छल निर्जल निर्मल प्राणी
परब्रह्म की ओट में राजा
मेरे मूरख मन का खेल भरम
जग सुलगा शहद बताशा .....!!
एक बगल सबके कर्मों की ईश्वर बना वजह है
एक बगल इन्सां के कर्मों का सन्दूक खुला है
एक बगल बिन मर्ज़ी के हिलना पत्ते का मना है
एक बगल मासूम के मातम में खुद ख़ुदा सना है
एक बगल मजबूर को उजड़ी छत का मिला मकां है
एक बगल छत के पुर्ज़ों की आलीशान दुकां है ......!!
क्यों हाड़ निगलती नदियों का पानी प्रसाद बना है
क्यों बैर पीसने दुनियाँ का चाकी में पिसा चना है ...!!
यहाँ ढोंगी सन्यासी और चाटू के अल्फ़ाज़ बड़े हैं
यमलोक में सिंहासन की बारी पर भी दाव लगे हैं
उजले कपड़ों के जमघट में दिखते सब लोग भले हैं
अपराध की फ़ैहरिस्तों में जाने किसके हाथ जले हैं ...!!
काया बेचारी बेसुध सी सर ढांप ढांप मँडरायी
कहीं राम का रंग मैला है कहीं अली को सुध ना आयी
कहीं गिरिजा और गुरुद्वारे में मँगतों ने हँसी हँसायी ...!!
मन कैसा बेपरवाज़ हुआ ना धर्म का कल और आज हुआ
घूमे फिरकी सा चार पहर आदम ये क़बूतर - बाज़ हुआ ...!!
धरे कच्चे फल पे कोई भसम रख माथे तिलक ज़रा सा
बहरूप है तू ना करे शरम करे जन्तर जोड़ तमाशा ........!!
मेरे मूरख मन का खेल भरम
जग सुलगा शहद बताशा .....!!
******* विक्रम चौधरी *******

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