Tuesday, 6 January 2015

" यमदूत ....."


















" यमदूत ....."

चिमनी   के   बीच   धधकती   ये   दुनियाँ
फूलों   की   आँख   से   टपके   अग्नियाँ
हवा   ने   पहनी   कमीज   रे   काली
धूएँ   का   बादल   जैसे   मवाली  …
भागो   रे   भागो   आया   भूत
नदी   किनारे   यमदूत    ……!!

पंछी   कहे   चल   संग   मेरे   आज
करके   बंद   घर   का   दरवाज़ा  …
खोलेंगे   दूर   गगन   में   दुकनियाँ
धरती   की   गोद   में   बैठी   नागिनियाँ
होठों   पे   सबके   तमीज   में   गाली
कुर्ता   सफ़ेद   ये   करता   जुगाली  …
झूठों   को   मिली   भली   छूट
नदी   किनारे   यमदूत    ……..!!

माटी   कहे    मेरा   तन   धुलवाजा
पहले   से   रंग   में   मोहे   रंगवाजा  …
पहनूँगी   पैरों   में   मैं   भी   पैजनियाँ
जाने   उतारी   ये   किसने   नथनियाँ
ऊँचे   बाज़ार   में   जेब   है   खाली
सोने   की   नगरी   में   बन्दा   सवाली
चेहरों   पे   पुती   है   भभूत
भागो   रे   भागो   आया   भूत  …
नदी   किनारे   यमदूत   ….!!

***** विक्रम  चौधरी ******

" खाली खाली ...."


















" खाली   खाली ...."

खाली   खाली   ग़म   सवाली
मारे   टूटे   दिल   पे   ताली  ...
आँख   में   आँसू   की   दस्तक
दे   रही   क़िस्मत   को   गाली ...

खाली   खाली   ग़म   सवाली  ...!!

दुनियाँ   हराम   की   मेरे   किस   काम   की
किसको   फ़िक़र   मेरे   हिस्से   के   आराम   की  ...
जिस्मों   के   बीच   है   जिस्म   की   दलाली  ...

खाली   खाली   ग़म   सवाली  ...!!

फूलों   की   आड़   में   काँटों   का   झाड़   है
रौशन   बाज़ार   में   भूखों   की   बाड़   है  ...
महँगी   पोशाक   में   गोल   है   मवाली  ...

खाली   खाली   ग़म   सवाली  ...!!

करने   को   धोखा   हर   बन्दा   तैयार   है
मौके   पे   चौके   का   सबको   इंतज़ार   है  ...
चढ़ता   कमान   पे   तीर   भी   ख़याली  ...

खाली   खाली   ग़म   सवाली  ...!!

***** विक्रम  चौधरी *****

Sunday, 19 October 2014

" सैयाँ बड़ा बेईमान ...."

















" सैयाँ  बड़ा  बेईमान ...."

सखी  मोरा  सैयाँ  बड़ा  बेईमान
डारे  नजर  नाहीं  जाए  रे  जान ...!!

खनक  सी  भरे  रे  हियरा
पनघट  पे  शाम ...
रात  की  नथ  पे  उतरा  है  चाँद ...
घुँघरू  पायलिया  के  रुनझुन  रुनझुन
बिरहा  के  मद  में  गावें  सजन  धुन ...

धरे  ना  पिहरवा  अँसुअन  पे  कान
सखी  मोरा  सैयाँ  बड़ा  बेईमान ....!!

भरम  सौ  करे  रे  पुरवा
जपै  तोरा  नाम ...
मन  की  अगन  क्यों  जाने  ना  राम ...
पिया  की  लगन  में  खोये  बैठी  सुध  बुध
लागे  नाहीं  मनवा  बन  गयी  मैं  तो  बुत ...

करो  ना  साँवरिया  मोहे  बदनाम
सखी  मोरा  सैयाँ  बड़ा  बेईमान ......!!


******* विक्रम  चौधरी ********

Monday, 6 October 2014

" खानाबदोशी ....."


















" खानाबदोशी ....." 

जीने  के  हर  अंदाज़  में  है  सरफ़रोशी  
माँगी  थी  आज़ादी  मिली  खानाबदोशी 

माँगी  थी  ज़िल्लत  से  परे  घर  घर  में  रोटी 
मिल  गयी  तख्तों  से  उतरी  खूं  की  बोटी 

एक  तरफ़  डेमोक्रेसी  के  फंदे  में  गरदन  फँसी 
एक  तरफ़  रोज़ी  के  लफड़ों  में  हुयी  है  ख़ुदकुशी 

ये  रपट  जा  करके  किस  थाने  में  अब  लिखवाएँ  हम 
सरकार  को  चुप  देख  कर  गूँगों  को  आती  है  हँसी 

बात  ये  भी  कल  के  एक  अखबार  में  छप  जायेगी 
और  दादी  माँ  भी  उस  पर  रख  चने  फिर  खायेगी 

लाज़मी  है  तयबाज़ारी  पर  यहाँ  जूताकशी 
पूँजीपतियों  और  नेताओं  में  है  रस्साकसी 

आओ  जनता  को  भी  पहना  दो  ज़रा  चश्मा  नया 
हम  ही  हैं  क़त्ल - ए - वतन  ना  होने  दो  इसको  बयां 

मरने  के  इस  एहसास  में  है  कौन  दोषी 
माँगी  थी  आज़ादी  मिली  खानाबदोशी ......!!


"" विक्रम  चौधरी ""
  

Wednesday, 24 September 2014

" बशर नये ...."















" बशर  नये ...."

क़ातिलों  को  मिल  गए  बशर  नये
मिल  गए  दरिन्दों  को  शहर  नये ...!

किसका  इंतज़ार  कर  रहे  हो  तुम  बताओ  तो 
सामने  हैं  खिलखिलाहटें  उन्हें  सताओ  तो 

काट  लो  या  खौंस  लो
हँसी  को  लब  से  नौंच  लो
गोस्त  जो  पड़ा  ज़मीन  पर  
उसे  भी  पौंछ  लो  …

बिगड़े  हाल  का  मज़ाक  तुमने  भी  उड़ा  लिया
सोते  पंछी  का  घरौंदा  हमने  भी  चुरा  लिया ...
झूठ  के  लिबास  को  तुमने  आज़मा  लिया
सत्य  के  लिहाफ़  का  हमने  ख़ातमा  किया ….
 
जीतने  में  देर  हम  भी  क्यों  करें
मर  गए  हैं  थोड़ा  थोड़ा  और  मरें ...
  
क़ातिलों  को  मिल  गए  बशर  नये
मिल  गए  दरिन्दों  को  शहर  नये ....!!


"" विक्रम  चौधरी ""

" साँचा नाम ....."












" साँचा  नाम ....."

फैंको  झूठी  बोलियाँ
लेके  साँचा  नाम ...!
चाहे  तो  अल्लाह  कहो
या  बोलो  सिया  राम ....!!

भीतर  भीतर  एक  हैं
मानस  के  हर  काम
फिर  काहे  को  बँट  गए
टुकड़ा  टुकड़ा  गाम ....!!

पेट  भरे  की  नियति
कर  बैठी  संग्राम
क़तरा  क़तरा  ख़ून  का
खोजे  तन  की  छाओं ....!!

दानव  ओढ़े  चूनरी
डोल  रहा  सब  धाम
घर  घर  जाके  माँग  रहा
भिक्षा  में  विश्राम .......!!


"" विक्रम  चौधरी ""

Friday, 18 July 2014

" क्या पता .... "















" क्या  पता .... "

आँख  लग  जाने  से  पहले 
हम  हँसें  तुम  भी  हँसो ...!
शाम  ढल  जाने  से  पहले
हम  चलें  तुम  भी  चलो ...!!

क्या  पता  उस  ख़ाब  के  हाथों  से  हो  जाएँ  क़तल
क्या  पता  रातों  में  रास्ता  पाँओ  से  जाए  फिसल
जेब  के  कोने  सिलो
देखो  जहाँ  भी  छेद  हो
बेवजह  खोलो  ना  मुट्ठी
चाहे  जितनी  रेत  हो

चील  के  तकने  से  पहले
हम  उठें  तुम  भी  उठो ...!
साँस  फट  जाने  से  पहले
हम  लड़ें  तुम  भी  लड़ो ...!! 

क्या  पता  उस  घाव  के  टुकड़े  से  बन  जाए  ग़ज़ल
क्या  पता  फिर  ज़िन्दगी  आ  जाए  घर  मौज़ू  बदल 
ज़ेर  को  ज़िन्दा  रखो
मुश्क़िल  भले  ही  जीत  हो
तैश  के  काँधों  से  उतरो
इल्म  जब  ख़ुर्शीद  हो

आँख  लग  जाने  से  पहले 
हम  हँसें  तुम  भी  हँसो ...!
शाम  ढल  जाने  से  पहले
हम  चलें  तुम  भी  चलो ...!!


"" विक्रम  चौधरी ""

मौज़ू - विषय
ज़ेर= हारा हुआ
ख़ुर्शीद - सूर्य

Saturday, 5 July 2014

" काल का बटका ...."
















" काल  का  बटका ...."

काल  का  बटका  भर  के  बोली
पीतल  की  दो  सूंत  की  गोली
लाल  करें  कुछ  सर्द  हवाएँ
आओ  चलो  मिल  खेलें  होली ...!!

जिद  मरी  जीत  की  परी
इत  मरी  कुछ  उत  मरी
साथ  लिए  कुछ  माँस  के  टुकड़े
उछल  के  मेरे  द्वार  पड़ी .......!!

गुंचा  गुंचा  बाग़  उजाड़े
बरगद  के  दो  वृक्ष  उखाड़े
मानवता  के  बोल  वचन  ने
मानव  के  अरमान  बिगाड़े ......!!

देख  सजन  अन्धों  की  टोली
काणे  ने  पहनी  तंग  चोली
खेल  रहा  गंभीर  कलाएं
भरे  निरंतर  खाली  झोली ......!!

***** विक्रम  चौधरी *****


Friday, 27 June 2014

" बम बम अली शंकर ...."











" बम  बम  अली  शंकर ...."

बम  बम  अली  शंकर
अगड़  बम  बम  अली  शंकर ...!!

बैर  भूत  परवान  चढ़ा  दे
कुण्ठा  को  श्मशान  दिखा  दे
निश्छल  निर्मल  बहते  जल  में
मार  ना  तू  कंकर  ..............!
बम  बम  अली  शंकर ...........!!

एक  हाथ  रख  शंखनाद 
रख  एक  हाथ  में  बूटी
अलख  निरंजन  साँच  सुबक  ले
बाक़ी  बात  है  झूठी
जंगल  जंगल  बिछा  के  मंगल
मार  ना  तू  मंतर ................!
गंगा  में  रोज़  नहाने  से 
ना  होगा  तू  सुन्दर ..............!
बम  बम  अली  शंकर ...........!!

पूरे  पथ  का  बन  जा  तू  पथिक
आधे  में  नहीं  रहबर .....
सुलगे  ग़र  तन  तो  डाल  भसम
फूलों  में  छुपे  खंजर ......
आनन्द  अनंत  की  भूख  हुआ 
मानस  भी  हुआ  बन्दर .........!!
बम  बम  अली  शंकर ...........!!

****** विक्रम चौधरी *******

Wednesday, 18 June 2014

" हू ...."
















" हू ...."

मेरे  अंदर  हू  है 
तेरे  अंदर  हू
मेरा  मुझमें  साईयाँ
मैं  यार  क़लन्दर  हू ....!!

मेरे  अंदर  हू  है 
तेरे  अंदर  हू .............!!

काटे  ते  ना  कटे
रूह  की  बेड़ी  जां  तले ..!
छोड़े  ना  पीछा  चले  पीछे
जहाँ  तन  जले ...!!

चुघे  घट  घट  कालजा
ना  मिटे  मंजर  हू
मेरे  अंदर  हू  है 
तेरे  अंदर  हू .............!!

देखे  चौबारा  फिर  दोबारा
जान  बन  पले .....!
फिरे  रे  राही  मारा  मारा
साँस  बंद  पड़े .....!!

चुने  चिड़ियाँ  घौंसला 
ना  थमे  अंधड़  हू
मेरे  अंदर  हू  है 
तेरे  अंदर  हू .............!!


*** विक्रम  चौधरी ***