Friday, 4 March 2016

" तू बस हाँ कह देना ...."

















तू  बस  हाँ  कह  देना
मुझे  बाहों  में  भर  लेना
कोई  देख  ना  पाये  हमको
मुझे  दूर  कहीं  ले  चलना ....

फिर  देखना  मेरे  नैना  गज़ब  कर  देंगे
रंग  भर  देंगे  तुझमें  मुझको  रंग  देंगे ....
धड़कन  चुपचाप  रहेगी  कदम  चल  देंगे
लब  खोल  के  अल्फ़ाज़ों  को  दिल  पे  रख  देंगे ....!!

मैं  चुपके  चुपके  हाथ  के  नीचे  चाँद  छुपाकर  ले  आऊँगी
तू  हौले  हौले  तारों  को  छत  पर  ले  आना
मैं  धीमे  धीमे  उलझी  सारी  लट  सुलझा  कर  आ  जाऊँगी
तू  टिप्पी  टिप्पी  बालों  में  जुगनू  भर  देना ....

तू  बस  हाथ  पकड़ना  मुझे  उड़  चलने  को  कहना
फिर  देखना  मेरे  नैना  गज़ब  कर  देंगे
रंग  भर  देंगे  तुझमें  मुझको  रंग  देंगे .................!!

मैं  तिनका  तिनका  ख़ाब  की  बातें  हार  बना  कर  पहनाऊँगी
तू  मुट्ठी  भर  क़िस्सों  को  सारी  रात  सुनाना
मैं  आँखें  मीचे  दूर  कहानी  के  रस्ते  पर  खो  जाऊँगी
तू  साँस  की  डोर  से  खींच  के  मुझको  वापस  लाना ....!!

मैं  फिर  शाख़  बनूँगी  तू  पत्तों  सा  जुड़  जाना
मैं  एक  झील  बनूँगी  तू  कश्ती  सा  बल  खाना
मैं  एहसास  बुनूँगी  तू  लम्हों  को  लहराना
मैं  शुरुआत  करूँगी  तू  आख़िर  तक  ले  जाना ....

फिर  देखना  मेरे  नैना  गज़ब  कर  देंगे
रंग  भर  देंगे  तुझमें  मुझको  रंग  देंगे ...........................!!


"" विक्रम  चौधरी ""

Thursday, 3 March 2016

" ओ रे मोरे पिया ...."

















"  ओ  रे  मोरे  पिया  ...."

ओ  रे  मोरे  पिया
ले  जा  मोरा  जिया ...
दे  जा  गगन  शगनों  का
अँखियों  में  घर  सपनों  का

खाली  रैन  मन  भर  लूँगी  मैं
नैना  संग  तोहे  पढ़  लूँगी  मैं
पूरी  कर  दे  तू  दिल  की  दुआ ....
ओ  रे  मोरे  पिया  , ले  जा  मोरा  जिया ....!!


सपनों  से  आगे  उड़  जाऊँ  मैं
परियों  से  जाके  लड़  जाऊँ  मैं
तू  जो  कहे  तो  जुड़  जाऊँ  मैं
बूँदों  के  गीले  अंग  से
फूलों  के  पीले  रंग  से
बन  के  आब  गिरूँ  चिड़ियों  के  पंख  पे ....

ओ  रे  मोरे  पिया ..................................!!

झरनों  पे  जाके  झर  जाऊँ  मैं
बदरा  पे  जाके  घिर  जाऊँ  मैं
तू  जो  कहे  तो  जुड़  जाऊँ  मैं
चाँद  के  टूटे  अंग  से
माटी  के  भूरे रंग  से
बन  के  धार  चलूँ  नदियों  के  संग  में ....

ओ  रे  मोरे  पिया , ले  जा  मोरा  जिया .....!!

"" विक्रम  चौधरी ""

Wednesday, 2 March 2016

" फ़िरंग दरिंदे सा ...."



















" फ़िरंग  दरिंदे  सा ...."

क्या  साँस  पे  धूप  सा  जलता  है
क्या  अन्दर  मुझमें  गलता  है
क्या  वक़्त  फ़िरंग  दरिंदे  सा
सीने  में  मौत  सा  पलता  है ...!!

दिल  मुझसे  कहे  उड़  जाऊँ  मैं
सौ  बादल  पार  हो  जाऊँ  मैं ...

नादान  है  वो  कम  सुनता  है
बेजान  से  धागे  बुनता  है
क्या  वक़्त  फ़िरंग  दरिंदे  सा
सीने  में  मौत  सा  पलता  है ...!!

दो  गाल  पे  थपकी  बहला  दो
धड़कन  को  थाम  के  सहला  दो
रख  दो  धूआँ  सिरहाने  पर
नींदों  में  ख़ाब  को  सुलगा  दो
आँखों  से  अश्क़  जो  निकलें  तो
अश्क़ों  को  राख़  से  नहला  दो ....!!

पागलपन  शोर  उगलता  है
ख़ाबों  में  चाँद  उबलता  है
क्या  वक़्त  फ़िरंग  दरिंदे  सा
सीने  में  मौत  सा  पलता  है ...!!

क्या  वक़्त  के  ढीठ  निवाले  में
गाढ़ा  सा  ख़ून  का  क़तरा  है
ख़्वाहिश  के  काँपते  चेहरे  से
चेहरा  कोई  टूट  के  उतरा  है
ख़ामोश  है  वो  चुप  रहता  है
बिन  बोले  सब  कुछ  कहता  है

क्या  वक़्त  फ़िरंग  दरिंदे  सा
सीने  में  मौत  सा  पलता  है ....!!

क्या  साँस  पे  धूप  सा  जलता  है
क्या  अन्दर  मुझमें  गलता  है
क्या  वक़्त  फ़िरंग  दरिंदे  सा
सीने  में  मौत  सा  पलता  है ....!!

"" विक्रम  चौधरी ""

Tuesday, 6 January 2015

" सारे लम्हे ....."


















" सारे  लम्हे ....."

बेज़ुबान  थे  वो  सारे  लम्हे
सख़्तजान  थे  वो  सारे  लम्हे
तान  चादर  सर  छुपा  कर  सो  रहे  थे
सर  क़लम  इन्सान  के  जब  हो  रहे  थे ...!!

झील  सी  आँखों  में  क़तरा  ख़ून  का  था
अक़्स  मातम  का  वो  लेकर  घूमता  था
ज़र्द  हाल  थे  वो  सारे  लम्हे
उधड़ी  खाल  थे  वो  सारे  लम्हे

हादसों  पर  मारे  डर  कर  सो  रहे  थे
सौ  जनम  शैतान  के  जब  हो  रहे  थे .......!!

चाँदनी  रातों  का  चंदा  गुमशुदा  था
बादलों  में  मौन  हो  कर  वो  छुपा  था
बेईमान  थे  वो  सारे  लम्हे
दिल  पे  दाग़  थे  वो  सारे  लम्हे

गर्द  पी  कर  ख़ुद  को  सीं  कर  सो  रहे  थे
दर्द  जब  ज़ालिम  क़सीदे  बो  रहे  थे .........!!

******* विक्रम  चौधरी ********

" यमदूत ....."


















" यमदूत ....."

चिमनी   के   बीच   धधकती   ये   दुनियाँ
फूलों   की   आँख   से   टपके   अग्नियाँ
हवा   ने   पहनी   कमीज   रे   काली
धूएँ   का   बादल   जैसे   मवाली  …
भागो   रे   भागो   आया   भूत
नदी   किनारे   यमदूत    ……!!

पंछी   कहे   चल   संग   मेरे   आज
करके   बंद   घर   का   दरवाज़ा  …
खोलेंगे   दूर   गगन   में   दुकनियाँ
धरती   की   गोद   में   बैठी   नागिनियाँ
होठों   पे   सबके   तमीज   में   गाली
कुर्ता   सफ़ेद   ये   करता   जुगाली  …
झूठों   को   मिली   भली   छूट
नदी   किनारे   यमदूत    ……..!!

माटी   कहे    मेरा   तन   धुलवाजा
पहले   से   रंग   में   मोहे   रंगवाजा  …
पहनूँगी   पैरों   में   मैं   भी   पैजनियाँ
जाने   उतारी   ये   किसने   नथनियाँ
ऊँचे   बाज़ार   में   जेब   है   खाली
सोने   की   नगरी   में   बन्दा   सवाली
चेहरों   पे   पुती   है   भभूत
भागो   रे   भागो   आया   भूत  …
नदी   किनारे   यमदूत   ….!!

***** विक्रम  चौधरी ******

" खाली खाली ...."


















" खाली   खाली ...."

खाली   खाली   ग़म   सवाली
मारे   टूटे   दिल   पे   ताली  ...
आँख   में   आँसू   की   दस्तक
दे   रही   क़िस्मत   को   गाली ...

खाली   खाली   ग़म   सवाली  ...!!

दुनियाँ   हराम   की   मेरे   किस   काम   की
किसको   फ़िक़र   मेरे   हिस्से   के   आराम   की  ...
जिस्मों   के   बीच   है   जिस्म   की   दलाली  ...

खाली   खाली   ग़म   सवाली  ...!!

फूलों   की   आड़   में   काँटों   का   झाड़   है
रौशन   बाज़ार   में   भूखों   की   बाड़   है  ...
महँगी   पोशाक   में   गोल   है   मवाली  ...

खाली   खाली   ग़म   सवाली  ...!!

करने   को   धोखा   हर   बन्दा   तैयार   है
मौके   पे   चौके   का   सबको   इंतज़ार   है  ...
चढ़ता   कमान   पे   तीर   भी   ख़याली  ...

खाली   खाली   ग़म   सवाली  ...!!

***** विक्रम  चौधरी *****

Sunday, 19 October 2014

" सैयाँ बड़ा बेईमान ...."

















" सैयाँ  बड़ा  बेईमान ...."

सखी  मोरा  सैयाँ  बड़ा  बेईमान
डारे  नजर  नाहीं  जाए  रे  जान ...!!

खनक  सी  भरे  रे  हियरा
पनघट  पे  शाम ...
रात  की  नथ  पे  उतरा  है  चाँद ...
घुँघरू  पायलिया  के  रुनझुन  रुनझुन
बिरहा  के  मद  में  गावें  सजन  धुन ...

धरे  ना  पिहरवा  अँसुअन  पे  कान
सखी  मोरा  सैयाँ  बड़ा  बेईमान ....!!

भरम  सौ  करे  रे  पुरवा
जपै  तोरा  नाम ...
मन  की  अगन  क्यों  जाने  ना  राम ...
पिया  की  लगन  में  खोये  बैठी  सुध  बुध
लागे  नाहीं  मनवा  बन  गयी  मैं  तो  बुत ...

करो  ना  साँवरिया  मोहे  बदनाम
सखी  मोरा  सैयाँ  बड़ा  बेईमान ......!!


******* विक्रम  चौधरी ********

Monday, 6 October 2014

" खानाबदोशी ....."


















" खानाबदोशी ....." 

जीने  के  हर  अंदाज़  में  है  सरफ़रोशी  
माँगी  थी  आज़ादी  मिली  खानाबदोशी 

माँगी  थी  ज़िल्लत  से  परे  घर  घर  में  रोटी 
मिल  गयी  तख्तों  से  उतरी  खूं  की  बोटी 

एक  तरफ़  डेमोक्रेसी  के  फंदे  में  गरदन  फँसी 
एक  तरफ़  रोज़ी  के  लफड़ों  में  हुयी  है  ख़ुदकुशी 

ये  रपट  जा  करके  किस  थाने  में  अब  लिखवाएँ  हम 
सरकार  को  चुप  देख  कर  गूँगों  को  आती  है  हँसी 

बात  ये  भी  कल  के  एक  अखबार  में  छप  जायेगी 
और  दादी  माँ  भी  उस  पर  रख  चने  फिर  खायेगी 

लाज़मी  है  तयबाज़ारी  पर  यहाँ  जूताकशी 
पूँजीपतियों  और  नेताओं  में  है  रस्साकसी 

आओ  जनता  को  भी  पहना  दो  ज़रा  चश्मा  नया 
हम  ही  हैं  क़त्ल - ए - वतन  ना  होने  दो  इसको  बयां 

मरने  के  इस  एहसास  में  है  कौन  दोषी 
माँगी  थी  आज़ादी  मिली  खानाबदोशी ......!!


"" विक्रम  चौधरी ""
  

Wednesday, 24 September 2014

" बशर नये ...."















" बशर  नये ...."

क़ातिलों  को  मिल  गए  बशर  नये
मिल  गए  दरिन्दों  को  शहर  नये ...!

किसका  इंतज़ार  कर  रहे  हो  तुम  बताओ  तो 
सामने  हैं  खिलखिलाहटें  उन्हें  सताओ  तो 

काट  लो  या  खौंस  लो
हँसी  को  लब  से  नौंच  लो
गोस्त  जो  पड़ा  ज़मीन  पर  
उसे  भी  पौंछ  लो  …

बिगड़े  हाल  का  मज़ाक  तुमने  भी  उड़ा  लिया
सोते  पंछी  का  घरौंदा  हमने  भी  चुरा  लिया ...
झूठ  के  लिबास  को  तुमने  आज़मा  लिया
सत्य  के  लिहाफ़  का  हमने  ख़ातमा  किया ….
 
जीतने  में  देर  हम  भी  क्यों  करें
मर  गए  हैं  थोड़ा  थोड़ा  और  मरें ...
  
क़ातिलों  को  मिल  गए  बशर  नये
मिल  गए  दरिन्दों  को  शहर  नये ....!!


"" विक्रम  चौधरी ""

" साँचा नाम ....."












" साँचा  नाम ....."

फैंको  झूठी  बोलियाँ
लेके  साँचा  नाम ...!
चाहे  तो  अल्लाह  कहो
या  बोलो  सिया  राम ....!!

भीतर  भीतर  एक  हैं
मानस  के  हर  काम
फिर  काहे  को  बँट  गए
टुकड़ा  टुकड़ा  गाम ....!!

पेट  भरे  की  नियति
कर  बैठी  संग्राम
क़तरा  क़तरा  ख़ून  का
खोजे  तन  की  छाओं ....!!

दानव  ओढ़े  चूनरी
डोल  रहा  सब  धाम
घर  घर  जाके  माँग  रहा
भिक्षा  में  विश्राम .......!!


"" विक्रम  चौधरी ""