" खानाबदोशी
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जीने के हर अंदाज़ में है सरफ़रोशी
माँगी
थी आज़ादी मिली खानाबदोशी
माँगी
थी ज़िल्लत से परे घर घर में रोटी
मिल गयी तख्तों से उतरी खूं की बोटी
एक तरफ़ डेमोक्रेसी के फंदे में गरदन फँसी
एक तरफ़ रोज़ी के लफड़ों में हुयी है ख़ुदकुशी
ये रपट जा करके किस थाने में अब लिखवाएँ हम
सरकार
को चुप देख कर गूँगों को आती है हँसी
बात ये भी कल के एक अखबार में छप जायेगी
और दादी माँ भी उस पर रख चने फिर खायेगी
लाज़मी
है तयबाज़ारी पर यहाँ जूताकशी
पूँजीपतियों
और नेताओं में है रस्साकसी
आओ जनता को भी पहना दो ज़रा चश्मा नया
हम ही हैं क़त्ल - ए - वतन ना होने दो इसको बयां
मरने के इस एहसास में है कौन दोषी
माँगी
थी आज़ादी मिली खानाबदोशी ......!!
"" विक्रम चौधरी ""









